एडवांस्ड टेक्नोलाजी से मस्तिष्क में हो रहे गंभीर रक्तस्राव से कोविड वायरस से संक्रमित मरीज को मिला जीवनदान

गुरूग्राम: रतिराम (बदला हुआ नाम) को तीव्र सिरदर्द की शिकायत थी, जिसकी वजह से वह बेहोश भी हो जाता था। स्थानीय अस्पताल में हुई सीटी स्कैन से मालूम हुआ कि उसके मस्तिष्क में भारी रक्तस्राव हो रहा है। जांचों से मालूम हुआ कि मस्तिष्क के पिछले हिस्से में रक्त पहुंचाने वाली वर्टेब्रल आर्टरी फट गई है जिससे सुब्राक्नोईड हैमरेज हो रहा है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उसके मस्तिष्क की एक रक्त नलिका गुब्बारे की तरह फूलकर फट गई थी। प्राथमिक उपचार के तौर पर मरीज की खोपड़ी की केविटी में से एक छोटी ट्यूब पहुंचाकर रक्त और अन्य फ्ल्यूइड को बाहर निकाला गया ताकि मस्तिष्क पर दबाव को कम किया जा सके और मरीज को कोमा में जाने से रोका जा सके। मरीज कोविड वायरस से भी संक्रमित है।
मरीज को गुरूग्राम के आर्टेमिस हॉस्पिटल लाया गया जहां इमरजेंसी टीम ने कोविड प्रोटोकोल का पालन करते हुए मरीज का तुरंत इलाज शुरू कर दिया। इमरजेंसी कक्ष के आइसोलेशन रूम में अन्य जांचों से पता चला कि मरीज के फेफड़ों में काफी परिवर्तन परिलक्षित हो रहा है। कोविड आईसीयू में भर्ती किए गए इस मरीज का इलाज एक चुनौती साबित हो रहा था, क्योंकि कोविड संक्रमण के कारण उसकी हालत लगातार खराब हो रही थी। अग्रिम हॉस्पिटल के इंस्टिट्यूट ऑफ न्यूरोसांइसेस के डायरेक्टर डॉ विपुल गुप्ता ने बताया कि मस्तिष्क की क्षतिग्रस्त हो चुकी रक्त नलिकाओं के अध्ययन के लिए न्यूरोइंटरवेंशन टीम ने सावधानीपूर्वक एंजियोग्राफी की। इस परीक्षण से पता चला कि एक आर्टरी फूलकर फट चुकी है जिसमें से भारी रक्तस्राव हो रहा था।
रक्तस्राव को तत्काल सील करना जरूरी था कि और अधिक क्षति होने से रोका जा सके। किसी भी क्षतिग्रस्त रक्त नलिका को ठीक करने के लिए एक नए प्रोसिजर जिसे फ्लो डायवर्टर स्टेंट कहा जाता है उसे लगाया गया। यह एक पाइपनुमा डिवाइस होती है जो बहुत ही महीन जाली की बनी होती है। यह डिवाइस गुब्बारेनुमा फुली हुई नस में रक्त के प्रवाह को कम कर देती है जबकि स्वस्थ और सामान्य नसों में रक्त प्रवाह को सामान्य बनाए रखती है। खून को पतला करने की दवाएं देने के बाद यह डिवाइस सफलतापूर्वक मरीज के  मस्तिष्क में लगा दी गई। पैरों की रक्त वाहिकाओं में से एक छोटी ट्यूब निकालकर क्षतिग्रस्त आर्टरी और डिवाइस पर लगा दी गई ताकि हीलिंग शुरू हो सके। इस प्रोसीजर के जरिए नस के गुब्बारेनुमा स्थान पर एवं नस की अंदरूनी सतह पर हीलिंग की शुरूआत हो गई।
इस एंडवास्ड तकनीक के बारे में और अधिक जानकारी देते हुए डा.विपुल गुप्ता ने बताया अंतराल के बाद शरीर के टिश्यू फ्लो डायवर्टर डिवाइस को कवर कर लेते हैं और रक्त नलिका यानी आर्टरी का एक अभिन्न हिस्सा बन जाते हैं। इस तरह मरीज के एन्यूरिज्म का स्थाई इलाज भी हो जाता है। फ्लो डायवर्जन डिवाइस का इस्तेमाल बड़ी नसों जैसे गर्दन से मस्तिष्क को जाने वाली नसों के फूल जाने पर भी इस्तेमाल किया जा सकता है। यह डिवाइस एन्यूरिज्म को ठीक करने के क्षेत्र में सबसे नई टेक्नॉलाजी है जो अब उपलब्ध है।
इस मरीज के इलाज के दौरान चुनौती यह थी कि वह कोविड-19 के संक्रमण से भी जूझ रहा था जिसकी वजह से उसके फेफड़े भी क्षतिग्रस्त हो चुके थे। मरीज की सांस लेने की क्षमता खराब हो जाने की वजह से उसकी गरदन में एक छेद किया गया ताकि डायरेक्ट वेंटिलेशन दिया जा सके। डॉ.गुप्ता के मुताबिक मरीज को कोविड के लक्षणों के बढ़ने के दौरान काफी उतार चढाव का सामना करना पड़ा क्योंकि फेफड़ों में आ रहे परिवर्तनों के कारण उसकी हालत लगातार खराब हो रही थी। मरीज की खराब स्थिति के बावजूद न्यूरोइंटरवेशन टीम ने क्रिटिकल केअर और न्यूरोसर्जरी विभागों के साथ सामंजस्य बैठाते हुए मरीज का इलाज किया। इस वजह मरीज धीरे-धीरे रिकवर होने लगा। उसकी स्थिति नियंत्रण में आते ही डिस्चार्ज कर दिया गया। बाद में फालोअप के दौरान आने पर की गई एंजियोग्राफी परिक्षण से मालूम हुआ कि एन्यूरिज्म पूरी तरह ठीक हो चुका है और मरीज पूरी तरह रिकवर होकर सामान्य जीवन में लौट चुका है।

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