Editorial-विदेशी मतदाता: लोकतंत्र पर संकट की आहट

Editorial-Overseas voters: A sign of crisis for democracy

Editorial-Overseas voters: A sign of crisis for democracy
Editorial-Overseas voters: A sign of crisis for democracy

Editorial- बिहार में मतदाता सूची को लेकर जो खुलासे सामने आए हैं, वे वास्तव में लोकतंत्र की नींव को झकझोरने वाले हैं। लगभग सात करोड़ 90 लाख मतदाताओं की संख्या वाले इस राज्य में यदि बड़ी संख्या में अवैध वोटरों की मौजूदगी पाई गई है, तो यह एक अत्यंत गंभीर और चिंताजनक स्थिति है।

भारतीय निर्वाचन प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है, और इसीलिए यदि कोई व्यक्ति आगामी 1 अगस्त को प्रकाशित होने वाली प्रारंभिक मतदाता सूची में अपना नाम नहीं पाता है, तो उसे दस्तावेजों सहित आवेदन करने का पूरा अधिकार है। यह प्रक्रिया मतदान पंजीकरण अधिकारी से शुरू होकर जिला निर्वाचन अधिकारी और फिर राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी तक जाती है।

चुनाव आयोग ने भरोसा दिलाया है कि मतदाता सूची में जो नाम संदेह के घेरे में आए हैं, उनकी गहन जांच की जा रही है। जो लोग भारतीय नागरिक नहीं पाए जाएंगे, उनके नाम 30 सितंबर को जारी होने वाली अंतिम मतदाता सूची से हटा दिए जाएंगे। लेकिन यह बात बेहद चौंकाने वाली है कि विदेशी नागरिकों के नाम बिहार की वोटर लिस्ट में शामिल हैं — और इनकी संख्या लाखों में बताई जा रही है।

ऐसी स्थिति में यह अनिवार्य हो जाता है कि एक कठोर और निष्पक्ष प्रक्रिया अपनाई जाए ताकि कोई भी अवैध व्यक्ति मतदाता न बन सके। आयोग ने इस दिशा में 1 से 30 अगस्त तक विशेष जाँच अभियान चलाने की योजना बनाई है, जो निश्चित रूप से सराहनीय कदम है। यह अभियान उन सभी मामलों की छानबीन करेगा जहाँ नागरिकता को लेकर संदेह है।

हालाँकि, इस प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दलों और नागरिक संगठनों ने भी चिंता जाहिर की है। उनका कहना है कि इस पुनरीक्षण अभियान के चलते वास्तविक और पात्र मतदाताओं के अधिकारों का हनन हो सकता है। यही कारण है कि मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच चुका है, जहाँ 28 जुलाई को संबंधित याचिका पर सुनवाई होनी है। इसके बाद ही देशव्यापी पुनरीक्षण अभियान को लेकर अंतिम फैसला लिया जाएगा।

इस बीच बिहार की राजनीति में भी यह मुद्दा गर्माया हुआ है। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने आयोग से पारदर्शिता की माँग करते हुए कहा है कि केवल सूत्रों के हवाले से बयान देने की बजाय आयोग को स्वयं सामने आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

Read Also : Editorial : नागरिकता प्रमाणपत्र: ज़रूरत या औपचारिकता?

कुल मिलाकर, यह मामला सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं है। यह पूरे देश के लोकतांत्रिक ढांचे की साख से जुड़ा है। आवश्यक है कि हर मतदाता सूची को निष्पक्ष और सत्यापित बनाया जाए ताकि लोकतंत्र की विश्वसनीयता अक्षुण्ण बनी रहे।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button