महिलाओं में भी तेजी से बढ़ रहा फेफड़े का कैंसर

गुडगाँव । पश्चिमी देशों में महिलाओं में फेफड़े का कैंसर बढ़ने का एकमात्र सबसे बड़ा कारण धूम्रपान करना माना जाता है लेकिन भारतीय महिलाएं वातावरण में फैले प्रदूषण के कारण इस रोग का शिकार हो रही हैं। घर के बाहर वायु प्रदूषण के मुकाबले घर के अंदर होने वाला प्रदूषण ज्यादा खतरनाक और नुकसानदेह होता है। लकड़ी और मिट्टी तेल जैसे प्रदूषणकारी ईंधनों का इस्तेमाल करने से इससे निकलने वाले छोटे—छोटे प्रदूषित वायुकण फेफड़ों में गहरे तक पहुंच जाते हैं और फेफड़ों तक पहुंचते हुए सांसनली को बुरी तरह प्रभावित करते हैं जिस कारण लोग लंग कैंसर का शिकार हो जाते हैं।
हालांकि लंग कैंसर के मामले पुरुषों में ज्यादा पाए जाते हैं लेकिन पिछले 20 वर्षों से महिलाओं में इस कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसी पीड़ित महिलाओं में धूम्रपान नहीं करने वाली महिलाओं की तादाद बहुत ज्यादा है।
गुरुग्राम स्थित फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट में रेडिएशन आॅन्कोलॉजी के वरिष्ठ निदेशक और विभाग प्रमुख डॉ. अनिल कुमार आनंद ने कहा, ‘छोटे और मझोले शहरों में घरों में वायु प्रदूषण के खतरों और खराब वेंटिलेशन व्यवस्था के बारे में भारतीय महिलाओं को जानकारी देना बहुत महत्वपूर्ण है। हमें घर के अंदर और बाहर प्रदूषण के बारे में जागरूकता फैलाना होगा। जाहिर है कि सबसे ज्यादा जागरूकता छोटे और मझोले शहरों में खराब वेंटिलेशन व्यवस्था वाले घरों और रसोई के खतरों के बारे में बढ़ानी होगी और चूल्हे की जगह एलपीजी गैस के इस्तेमाल पर जोर देना होगा। दिल्ली—एनसीआर के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में महिलाओं में लंग कैंसर के बढ़ते मामलों का सबसे बड़ा कारण घर और बाहर के वायु प्रदूषण ही हैं।’
विश्व में लंग कैंसर को सबसे जानलेवा कैंसर माना जाता है जिस कारण सर्वाधिक मौतें होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, चूंकि इसके ज्यादातर मामले आखिरी चरण में ही डायग्नोज होते हैं इसलिए 2018 में लंग कैंसर के कारण कैंसर से होने वाली सर्वाधिक 20.9 लाख मौतें हुई हैं। प्रारंभिक चरण में इसके लक्षणों की पहचान नहीं हो पाती है और लोग अक्सर इसे मौसमी समस्या समझ कर खुद इलाज करने लग जाते हैं।
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, भारत में हर साल 43 लाख लोग घर के अंदर वायु प्रदूषण के कारण मरते हैं जो विश्व में सर्वाधिक है। यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत में 30 करोड़ से ज्यादा लोग खाना पकाने के लिए घर के अंदर ही परंपरागत चूल्हे या लकड़ी, कोयला, चारकोल, पराली आदि की आग का इस्तेमाल करते हैं। इस वजह से घर में सर्वाधिक वायु प्रदूषण होता है और प्रदूषक कण तथा कार्बन मोनोआॅक्साइड उत्पन्न होते हैं जो स्वास्थ्य की कई समस्या पैदा करते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के मुताबिक भारतीय ग्रामीण घरों में औसतन 20 गुना ज्यादा वायु प्रदूषण है। ग्रामीण घरों में खराब वेंटिलेशन व्यवस्था, घर के अंदर धुआं तथा आसपास की प्रदूषित हवा प्रदूषक कणों के निर्धारित स्तर से 100 गुना ज्यादा है। परिवार में घर के अंदर सर्वाधिक 80 फीसदी महिलाएं और छोटे बच्चे ही इससे प्रभावित होते हैं।
हालांकि इन वजहों से पुरुष और महिलाएं ज्यादा प्रभावित होती हैं लेकिन महिलाओं के लिए यह ज्यादा खतरनाक है क्योंकि वे घरों में ज्यादा समय रहती हैं। जागरूकता का अभाव और डॉक्टर से सलाह लेने में आनाकानी के कारण लंग कैंसर के मामले देरी से पकड़ में आते हैं। लिहाजा महिलाओं को यह जानना जरूरी है कि वे इस तरह की बीमारियों की चपेट में कैसे आ रही हैं।



