Editorial : वाणी पर संयम एवं शालीनता बहुत जरूरी

Editorial: Restraint and decency in speech are very important

Editorial: Restraint and decency in speech are very important

Editorial : लोकसभा चुनाव 2024 का चुनाव प्रचार अभियान में वाणी पर संयम शालीनता बरतनी बहुत जरूरी ैहै। राजनेताओं के नफरती और भड़काऊ भाषणों को लेकर चुनाव आयोग का सक्रिय होना नितान्त अपेक्षित है जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने भी समय-समय पर बिगड़े बोलो पर कड़ी टिप्पणियां की है। कोर्ट ने यहां तक कहा कि कुछ गलत होने पर उसे प्रधानमंत्री के खिलाफ कार्रवाई करने से भी नहीं हिचकना चाहिए।

चुनाव आयोग सख्ती दिखाए तो किसकी मजाल कि भरी सभाओं में जहर उगलती भाषा का इस्तेमाल कर जाए। भाषा की मर्यादा सभी स्तर पर होनी चाहिए। राजनेता भी अच्छी तरह जानते हैं इसके बावजूद जुबान से जहरीले बोल सामने आते ही रहते हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे हो या राजद नेता लालूप्रसाद यादव प्रधानमंत्री को लेकर जो कुछ कहा हो भाजपा नेता ने सोनिया-राहुल को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हो, सार्वजनिक रूप से ऐसी टिप्पणियों को हेट स्पीच के दायरे से बाहर नहीं रखा जा सकता।

कांग्रेस-बीजेपी सहित अनेक राजनीतिक दलों के नेता ऐसे वक्तव्य देते हैं और विवाद बढ़ता देख बाद में सफाई देने से भी नहीं चूकते। आधुनिक तकनीकी एवं संचार -क्रांति के जमाने में हर व्यक्ति पत्रकार की भूमिका में हैं, सोशल मीडिया के दौर में जब हर हाथ में कैमरायुक्त मोबाइल रहने लगा है चुनावी सभाओं में कोई बयान सार्वजनिक हुए बिना रह ही नहीं सकता। राष्ट्रीय एकता एवं राजनीतिक ताने-बाने को ध्वस्त कर रहे जहरीले भाषणों की समस्या दिन-प्रतिदिन गंभीर होती जा रही है। विशेषत: महिला नेताओं एवं उम्मीदवारों पर की जा रही कथित विवादास्पद एवं अशालीन टिप्पणियां लोकतंत्र पर बदनुमा दाग बन रही है।

अक्सर चुनावों के दौर में राजनीति में बिगड़े बोल एवं नफरत की राजनीति कोई नई बात नहीं है। चर्चा में बने रहने के लिए ही सही, राजनेताओं के विवादित बयान गाहे-बगाहे सामने आ ही जाते हैं, लेकिन ऐसे बयान एक ऐसा परिवेश निर्मित करते हैं जिससे राजनेताओं एवं राजनीति के लिये घृणा पनपती है। लोकतंत्र का महापर्व चुनाव राजनीतिक दलों एवं नेताओं के भविष्य को निर्धारित करने का दुर्लभ अवसर है। ऐसे में सोचने की बात तो यह है कि राजनीतिक भावनाओं एवं नफरती सोच को प्रश्रय देने वाले राजनीतिक दल भी खतरे से खाली नहीं हैं।

Editorial : दया से भरपूर सादियो मेन

निश्चित ही यह विकृत एवं घृणित सोच वोट की राजनीति का हिस्सा बनती जा रही है। इस प्रवृत्ति पर अविलंब अंकुश लगाने की आवश्यकता है ताकि इस समस्या को नासूर बनने से पहले ही इस पर प्रभावी तरीके से नियंत्रण पाया जा सके। राजनीति में वाणी का संयम एवं शालीनता बहुत जरूरी है, क्योंकि शब्द आवाज नहीं करते पर इनके घाव बहुत गहरे होते हैं और इनका असर भी दूर तक पहुंचता है ।

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