Editorial : सशक्त नारी
Editorial: Strong woman

Editorial : विश्व में अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर जोरदार स्वागत कर उसके मान-सम्मान का विढोरा पीटा जा रहा है. किन्तु भारतीय संस्कृति आदिकाल से ही नारी को पुरुष के बराबर का दर्जा देने में कभी-भी विमुख नहीं हुई। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी भारतीय नारी कहीं कम नहीं है। विश्व में एक ही नहीं दो भारतीय नारियों ने चन्द्रमा पर पहुंचकर विजय का झंडा फहराया है यथा प्रथम कल्पना चावला तो दूसरी सुनीता विलियम्स।
भारतीय संस्कृति में नारी समाज के प्रति यह केवल शाब्दिक सद्भावना का प्रदर्शन ही नहीं है, अपितु भारतीय गृहस्थ जीवन में पदे पदे इनकी व्यावहारिकता सार्थकता सिद्ध है। आधुनिक काल में नारी सशक्त हुई है। यथा भारतीय नारीयां शक्ति पुज के रूप में प्रसिद्ध है। साहित्य के क्षेत्र में सरोजनी नायडू, महादेवी वर्मा, सरोजिनी प्रीतम, सुभद्रा कुमारी चौहान, तनुप्रिया, मीराबाई, आदि।
साहित्य के क्षेत्र में यदि रत्नावली न होती तो रामचरित मानस जैसे महान ग्रंथ का रचयिता तुलसीदासजी न होते। संस्कृत साहित्य में विद्योत्तमा जैसी विदुषी नारी ने कालिदास जैसे महाकवि को उत्कृष्ट संस्कृत साहित्य के सृजन के लिये प्रेरित किया। अति प्राचीनकाल में जब भारत सम्पूर्ण विश्व को अपने ज्ञान का प्रकाश पुंज फैला रहा था उस समय की विदुषियों को आज के इस प्रसंग पर हम विस्मृत नहीं कर सकते है, जिनमें प्रमुख है गार्गी, मैत्रेयी, अपला, अदिति, इन्द्राणी, सावित्री आदि कई नाम विशेष रूप से उल्लेखित है।
Read Also : Editorial : पहाड़ों में हो रहे विनाश पर लगाम जरूरी
शिक्षा के समस्त क्षेत्रों में विशेष योग्यता की सूची में देखे तो पुरुषों की अपेक्षा नारी की संख्या व स्थान तुलनात्मक ज्यादा ही है। समाज में ईश्वर भक्ति में भी राधाकृष्ण तो सीताराम का नाम लेकर नारी श्रेष्ठता का बिगुल बजाता रहा है। स्वयं गांधीजी ने नारी का सम्मान व श्रद्धा से उसे अपने जीवन भर प्रतिष्ठा दिलवायी। वे अन्धेरे में जाने से डरते थे तब उनकी माता पुतलीदेवी ने भगवान का नाम लेकर सामना करने को कहा। गांधीजी जीवन भर इस बात को माता का उपदेश मानकर अन्धेरा ही नहीं कठिनाईयों से भी सामना करते रहे। उनकी माता ही उनकी शक्ति का प्रमुख स्त्रोत रहा है।



