Editorial : पहाड़ों में हो रहे विनाश पर लगाम जरूरी
Editorial: It is necessary to curb the destruction taking place in the mountains

Editorial Today : पहाड़ी इलाकों में रहने वाले निवासियों का जीवन बेहद कठिन होता है। प्राकृतिक कारण इसे और जोखिमभरा बना देते हैं। ऐसे में प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि आपदाओं के लिहाज से जो इलाके संवेदनशील और बेहद खतरनाक हैं और जिन इलाकों में ऐसी आपदाओं के बारे में वैज्ञानिक सचेत करते रहे हैं, उन इलाकों में ऐसी सुविधाएं विकसित करने पर जोर दिया जाए जो बेहद गंभीर संकट में भी लोगों को बचा सकें।
उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदाओं के संकेत करीब चार दशक पहले से ही मिलने लगे थे। भूविज्ञानी पहले ही चेतावनी दे चुके थे कि ऋषिगंगा क्षेत्र में आठ हिमनदों के पिघलने की दर सामान्य से अधिक है। जाहिर है कि जब-जब ये टूटेंगे तो ऋषिगंगा में ही गिरेंगे और कहर बरपाएंगे।
ऋषिगंगा नदी पर हिमनदों के टूटने से जो दबाव बनता है, उससे आसपास की नदियों-धौलीगंगा, विष्णुगंगा, अलकनंदा और भागीरथी में जल प्रवाह उग्र रूप धारण कर लेता है। हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्यों को हाल के वर्षों में कई प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ा है।
बीते कुछ महीनों में घटित ऐसी सभी घटनाओं के कारण अब तक 300 से अधिक लोगों की मृत्यु हुई है और हजारों लोग घायल हुए हैं। लापता होने वाले लोगों की संख्या भी कम नहीं है। बड़े पैमाने पर आर्थिक नुकसान के साथ-साथ सड़कों पर आवाजाही भी बड़े पैमाने पर बाधित हुई। हाल ही में माणा में एक दुखद आपदा में प्राकृतिक हिमस्खलन से निर्माण कार्य में लगे ८ लोगों की मौत हो गई।
उत्तराखंड और हिमाचल में प्राकृतिक आपदाओं का आना कोई नई बात नहीं है। अपने नैसर्गिक सौंदर्य, अध्यात्म, और धार्मिक महत्व के लिए यह राज्य प्रसिद्ध है, लेकिन यह राज्य अपनी भौगोलिक संरचना के लिए भी बेहद संवेदनशील है। सरकार आपदा की स्थिति में राहत कार्य पहुंचाती है। पर, आज जरूरत है कि समस्या के जड़ को समझकर उसके प्रभावी समाधान के लिए सही रणनीतियों के विकास और उन पर अमल करने की। ऐसा करके ही पहाड़ों में हो रहे विनाश पर लगाम लगायी जा सकती है और टिकाऊ विकास को सुनिश्चित किया जा सकता है।



