जब स्ट्रोक का दौरा पड़ता है, उसके बाद का प्रत्येक मिनट मायने रखता है : डा. विपुल गुप्ता

गुरुग्राम। आर्टेमिस एग्रिम इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंसेज के डॉक्टरों ने गंभीर स्ट्रोक से पीडि़त 71 साल की महिला का जीवन बचाने के लिए मेकैनिकल थ्रोम्बेक्टोमी का सफल एडवांस्ड इलाज किया।

सही समय पर शुरू की गई इलाज प्रक्रिया से न सिर्फ उसकी जिंदगी बच गई बल्कि एक सप्ताह के अंदर वह पूरी तरह स्वस्थ होकर अपने काम पर लौट आई। मरीज खुद एक डॉक्टर की मां हैं और उन्हें अचानक बाएं हिस्से में कमजोरी महसूस होने लगी। परिवारवाले तुरंत भांप गए कि यह स्ट्रोक हो सकता है, उन्हें तत्काल स्थानीय अस्पताल ले गए। सभी तरह की जांच से पता चला कि मस्तिष्क के दाएं हिस्से में स्ट्रोक है और दाहिने हिस्से की आर्टरी से मस्तिष्क तक बड़ा रक्त थक्का बन गया था। इस वजह से मस्तिष्क के दाहिने हिस्से में रक्तप्रवाह अवरुद्ध हो गया था।मरीज का परिवार आर्टेमिस एग्रिम हॉस्पिटल में स्ट्रोक इंटरवेंशन टीम के संपर्क में थे। मरीज को आर्टेमिस लाने से पहले एक स्थानीय अस्पताल में रक्त नलिका खोलने के लिए मस्तिष्क में रक्त थक्का ढीला करने वाली दवा (टीपीए) दी गई थी। इस प्रक्रिया को मेकैनिकल थ्रोम्बेक्टोमीश् कहा जाता है।

हालांकि छोटे अवरोधों के लिए थक्का ढीला करने वाली दवा काफी कारगर होती है, लेकिन यह मामला बड़े अवरोध का था और इसमें तत्काल इलाज प्रक्रिया शुरू करने की जरूरत थी। आर्टेमिस एग्रिम इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंसेज में न्यूरोइंटरवेंशन के प्रमुख तथा स्ट्रोक यूनिट के सह निदेशक डॉ. विपुल गुप्ता ने कहा, स्ट्रोक इंटरवेंशनल टीम मरीज को शीघ्र न्यूरो इंटरवेंशनल कैथ लैब में भेजने की आपात स्थिति के लिए पूरी तरह तैयार थी, जहां रक्त नलिका खोलने के लिए एंडोवैस्कुलर प्रक्रिया थ्रोम्बेक्टोमी अपनाई गई। इस प्रक्रिया में टांगों की रक्त नलिका से एक पतली ट्यूब मस्तिष्क तक पहुंचाई गई जहां थक्का जम गया था। स्टेंट रिट्रिवर नामक इस डिवाइस को रक्त थक्के तक पहुंचा कर शरीर से निकाल लिया गया। इससे मस्तिष्क तक रक्त प्रवाह सुचारु हो गया। यह प्रक्रिया मरीज के अस्पताल पहुंचने के 30 मिनट के अंदर पूरी कर ली गई और वह पूरी तरह स्वस्थ हो गई तथा स्ट्रोक के दौरे के एक सप्ताह के अंदर ही नियमित काम करने लगी।

जब स्ट्रोक का दौरा पड़ता है, उसके बाद का प्रत्येक मिनट मायने रखता है, क्योंकि हर मिनट दो लाख कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं। हर मिनट मरीज का शरीर शिथिल पडऩे लगता है। अब हमारे पास स्ट्रोक के इलाज की आधुनिक पद्धतियां आ गई हैं, जिनमें शुरुआती चरण के इलाज से स्ट्रोक को रोका जा सकता है और मरीज को सामान्य स्थिति में लाया जा सकता है। हालांकि प्रभावी इलाज के लिए मरीज को स्ट्रोक दौरे के बाद के गोल्डन आवर्स के अंदर इलाज कराना जरूरी होता है। डॉ. विपुल गुप्ता का कहना है कि, मस्तिष्क की रक्त नलिकाओं में ब्लॉकेज को इंट्रोवेनस इंजेक्शन से खोला जा सकता है और इसके लिए 4.5 घंटे के अंदर रक्त थक्का ढीला करने वाली दवा (टीपीए) का इंजेक्शन दिया जाता है। जब कोई बड़ा थक्का होता है और मरीज टीपीए सीमा से बाहर की स्थिति में होता है, तो डॉक्टर रक्तनलिकाओं को खोलने के लिए मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी नामक इंटरवेंशनल प्रक्रिया अपनाते हैं। रक्त प्रवाह बहाल करते हुए ये प्रक्रियाएं मस्तिष्क कोशिकाओं को पुनर्जीवित करती हैं और मस्तिष्क की क्रियाओं को बहाल करती हैं। हालांकि ये पद्धतियां तभी प्रभावी होती हैं जब मरीज को स्ट्रोक के दौरे के कुछ ही घंटे के अंदर यानी गोल्डन आवर्स में अस्पताल लाया जाए।

मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी रक्त नलिकाएं खोलने में बहुत प्रभावी होती है लेकिन मरीज की रिकवरी इस बात पर निर्भर करती है कि उसे स्ट्रोक के दौरे के बाद कितनी जल्दी अस्पताल लाया जाता है। स्ट्रोक के मरीजों के लिए समय ही महत्वपूर्ण होता है। हम लोगों को स्ट्रोक के लक्षणों को पहचानने और इस बारे में जानने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। फास्ट (फेस ड्रॉपिंग, आर्म विकनेस, स्पीच स्लर्ड, टाइम टु कॉल एंबुलेंस) जान लें यानी इस दौरान चेहरा लटकने, बांहों में कमजोरी, बोली में लडख़ड़ाहट, एंबुलेंस तत्काल बुलाना बहुत जरूरी है। अपने प्रियजनों की जान बचाने के लिए ऐसी तत्काल कार्रवाई जरूर करें।

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