Editorial : मानव सुरक्षा के लिए ठोस कदम आवश्यक
Editorial: Concrete steps are necessary for human security

पिछले कुछ वर्षों में देशभर में आवारा कुत्तों के हमलों की घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, हर वर्ष 17 से 20 लाख लोग कुत्तों के काटने का शिकार बनते हैं। चिंता की बात यह है कि इनमें बड़ी संख्या बच्चों की होती है, क्योंकि उनकी ऊँचाई और नाजुक शारीरिक बनावट उन्हें कुत्तों का आसान लक्ष्य बना देती है।
हाल ही में अदालत ने इस विषय पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि “मानव जीवन और सुरक्षा पहले”-यह केवल एक कानूनी टिप्पणी नहीं, बल्कि समाज के लिए भी एक चेतावनी है कि इस समस्या को अब केवल भावनात्मक नजरिए से नहीं, बल्कि व्यावहारिक और ठोस समाधानों से निपटने की जरूरत है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति या संगठन इस प्रक्रिया में बाधा डालेगा, तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। इससे यह संकेत मिलता है कि “मानव जीवन बनाम पशु अधिकार” की बहस में अदालत ने प्राथमिकता स्पष्ट कर दी है।
यह समस्या केवल प्रशासनिक नहीं है, इसमें समाज की भी बड़ी भूमिका है। लोग अक्सर दया या धार्मिक भावनाओं से आवारा कुत्तों को घर के बाहर खाना डालते हैं। यह भावना सराहनीय जरूर है, लेकिन कई बार यह व्यवहार कुत्तों के झुंड बनने और उनके आक्रामक होने की संभावना को बढ़ा देता है। खासकर खुले में भोजन डालने से अन्य कुत्ते भी आकर्षित होते हैं और आस-पास के लोगों के लिए खतरा और अधिक बढ़ जाता है।
समाधान के लिए सबसे पहले बड़े पैमाने पर नसबंदी अभियान चलाना अनिवार्य है। प्रत्येक शहर, कस्बे और गांव में पर्याप्त संख्या में डॉग शेल्टर होने चाहिए, जहां कुत्तों को भोजन, पानी और चिकित्सा सुविधा दी जा सके। साथ ही, इन शेल्टरों का प्रबंधन पारदर्शी और जिम्मेदार तरीके से होना चाहिए ताकि वे केवल नाम मात्र के केंद्र बनकर न रह जाएं।
इसके अलावा, समाज को जागरूक करना भी जरूरी है। स्कूलों, मोहल्लों और पंचायतों के स्तर पर जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को यह बताया जाए कि कुत्तों से कैसे सुरक्षित दूरी बनाई जाए, और खुले में भोजन डालने से क्यों बचना चाहिए। नगर निकायों को भी सक्रिय होकर इस दिशा में काम करना होगा और जरूरत पड़ने पर कानून के माध्यम से अनुशासन सुनिश्चित करना होगा।
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पशु अधिकारों का सम्मान जरूरी है, लेकिन मानव जीवन और सुरक्षा उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। यदि हम संवेदनशीलता के साथ-साथ व्यावहारिकता भी अपनाएं तो यह समस्या काफी हद तक नियंत्रित हो सकती है और इंसान व पशु दोनों के लिए सुरक्षित माहौल बनाया जा सकता है।



