Editorial : टैरिफ की तानाशाही
Editorial : Dictatorship of tariffs

Editorial : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ऊँचे-ऊँचे टैरिफ लगाना कोई आर्थिक नीति से अधिक, वैश्विक राजनीति का दबाव बनाने का हथकंडा लगता है। भारत पर 50% टैरिफ की घोषणा ने इस आर्थिक आक्रामकता को खुलकर सामने ला दिया है। हालांकि, बदलते अंतरराष्ट्रीय समीकरणों के बीच भारत का आत्मविश्वास, ठोस नेतृत्व और रणनीतिक सोच यह साबित कर रहे हैं कि हम न केवल ऐसे दबाव का सामना कर सकते हैं, बल्कि इसे अपने विकास के अवसर में भी बदल सकते हैं।
यदि अमेरिका अपने बाजार का दरवाज़ा बंद करता है, तो भारत के पास अफ्रीका, रूस, अरब देशों और दक्षिण एशिया जैसे नए व्यापारिक साझेदारों की ओर बढ़ने के भरपूर मौके हैं। असली ताकत यह है कि हम एक ही बाजार पर निर्भर न रहें, बल्कि अपने उत्पादों और सेवाओं के लिए कई विकल्प तैयार रखें।
सरकार को चाहिए कि वह छोटे कारीगरों, किसानों और सूक्ष्म उद्यमियों को ऐसी सुविधाएं और समर्थन दे जिससे वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने योग्य सामान बना सकें। वैश्विक दबाव का सबसे अच्छा जवाब यही है कि देश की आर्थिक नींव इतनी मजबूत हो कि कोई बाहरी ताकत हमें झुका न सके।
इस समय प्रधानमंत्री को अमेरिका को त्वरित प्रतिक्रिया देने की बजाय चुपचाप देश के भीतर क्षमता बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए बिलकुल वैसे ही जैसे कोई धैर्यवान पिता अपने घर को मजबूत करता है जब पड़ोसी ऊँची आवाज़ में बातें करता है।
अमेरिका की आर्थिक दबंगई कोई नई बात नहीं है; प्रथम विश्व युद्ध के बाद से ही उसने वैश्विक व्यापार नीतियों में अपनी शर्तें थोपने की कोशिश की है। लेकिन आज हालात अलग हैं चीन पहले ही उसकी शर्तों के आगे झुकने से इंकार कर चुका है और अब भारत भी साफ संकेत दे रहा है कि उसके लिए सबसे बड़ा प्राथमिकता राष्ट्रीय हित हैं।
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हाल ही में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भारत-पाक तनाव कम करने का श्रेय लेने की अमेरिकी कोशिश को भारत ने सिरे से ठुकराया था। यही आत्मसम्मान और दृढ़ता हमें टैरिफ विवाद में भी अपनानी होगी।



