Editorial : टैरिफ का नया विश्व युद्ध
Editorial: The New World War of Tariffs

Editorial : आज की वैश्विक राजनीति में आर्थिक दबाव एक नया युद्धास्त्र बन चुका है, और टैरिफ इसका प्रमुख औजार है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पिछले कार्यकाल में “मेक अमेरिका ग्रेट अगेन” और “अमेरिका फर्स्ट” की नीतियों को जिस आक्रामक ढंग से आगे बढ़ाया था, उसका असर आज भी वैश्विक व्यापार प्रणाली पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। अब जब ट्रंप पुनः सक्रिय हो चुके हैं, तो यह कहना गलत नहीं होगा कि वैश्विक मंच पर टैरिफ के माध्यम से दबाव की राजनीति फिर से तेज हो गई है।
भारत और अमेरिका जैसे देश जब “अपने राष्ट्र को महान” बनाने की बात करते हैं, तो यह स्वाभाविक प्रतीत होता है। हर राष्ट्र को अपने हितों की रक्षा करने का अधिकार है। लेकिन यह अधिकार कब आक्रामक रणनीति में बदल जाता है, यह पहचानना कठिन नहीं है। टैरिफ, जो कभी राजस्व का एक माध्यम हुआ करता था, अब एक रणनीतिक हथियार बन गया है।
हाल ही में डोनाल्ड ट्रंप ने दो अलग-अलग अवसरों पर भारत को चेतावनी दी कि यदि भारत रूस से तेल की खरीद नहीं रोकता है, तो अमेरिका भारत पर 24 घंटे के भीतर भारी टैरिफ लगा देगा। यह न केवल भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक सीधा खतरा है, बल्कि एक संप्रभु राष्ट्र की स्वतंत्र विदेश नीति में हस्तक्षेप भी है। इस प्रकार की धमकियां एकतरफा दबाव की नीति को दर्शाती हैं जो अंतरराष्ट्रीय सहयोग की भावना के विपरीत है।
यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप प्रशासन या अमेरिका ने टैरिफ के माध्यम से देशों को झुकाने की कोशिश की हो। चीन के खिलाफ 145 प्रतिशत से अधिक के टैरिफ लगाए गए, यूरोपीय संघ के उत्पादों पर भारी शुल्क लगाया गया, और कनाडा तक को निशाना बनाया गया। ऐसे में यह कहना अनुचित नहीं होगा कि टैरिफ एक नया ‘शीत युद्ध’ बन चुका है — जिसमें गोलियों की जगह शुल्क दरें हैं, और सैनिकों की जगह कूटनीतिक बयानबाजियां।
भारत जैसे देश, जो विकासशील हैं और अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए विविध स्रोतों पर निर्भर हैं, के लिए यह रणनीति अत्यंत असंतुलित और नुकसानदायक है। रूस से तेल खरीद भारत के लिए केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक फैसला भी है। वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता और कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच भारत को किफायती दरों पर ऊर्जा की आपूर्ति सुनिश्चित करनी होती है। ऐसे में अमेरिका की टैरिफ वाली धमकी भारत की ऊर्जा नीति और आर्थिक स्थिरता पर सीधा आघात है।
टैरिफ का यह दबाव न केवल द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित करता है, बल्कि विश्व व्यापार संगठन (WTO) जैसे संस्थानों की भूमिका को भी चुनौती देता है। यदि वैश्विक शक्तियाँ इसी प्रकार टैरिफ का राजनीतिक हथियार के रूप में उपयोग करती रहीं, तो यह वैश्विक व्यापार व्यवस्था के लिए विनाशकारी सिद्ध होगा।
Editorial : देवभूमि से आपदा क्षेत्र तक
इस समय भारत को संतुलित रणनीति अपनाने की आवश्यकता है। एक ओर उसे अपने आर्थिक हितों की रक्षा करनी होगी, वहीं दूसरी ओर वैश्विक मंच पर स्वतंत्र विदेश नीति और व्यापारिक स्वायत्तता की मजबूती के लिए मुखर रहना होगा। अमेरिका जैसे शक्तिशाली देशों के दबाव का शांत, ठोस और कूटनीतिक उत्तर ही भारत को दीर्घकालिक लाभ दे सकता है।



