Editorial : देवभूमि से आपदा क्षेत्र तक

Editorial: From Devbhoomi to disaster zone

Editorial : कभी जिसे श्रद्धा और प्रकृति की भूमि कहा जाता था, वही उत्तराखंड अब धीरे-धीरे विनाश और त्रासदी का पर्याय बनता जा रहा है। हर साल बरसात का मौसम किसी गांव की मिट्टी छीन लेता है, किसी परिवार का आशियाना बहा ले जाता है, और किसी मासूम की जिंदगी छीन लेता है। वर्षा, भूस्खलन, बादल फटना और नदियों की धारा का अचानक बदल जाना अब सामान्य घटनाएं बन गई हैं।

उत्तराखंड में जिस तेज़ी से पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर अनियंत्रित विकास हुआ है, उसने पहाड़ों की सहनशीलता को तोड़ दिया है। हजारों वाहन, लाखों पर्यटक, प्लास्टिक के ढेर और घंटों जाम—यह सब मिलकर उस नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र पर भारी पड़ रहे हैं, जो कभी शांत और संतुलित था। जिन पहाड़ों पर कभी गर्मियों में पंखे की जरूरत नहीं होती थी, वहां अब अक्टूबर में भी एसी की ठंडक चाहिए।

हिमालय केवल भौगोलिक संरचना नहीं, एक भावनात्मक और आध्यात्मिक संतुलन भी है। लेकिन हमने उस संतुलन को अपने स्वार्थ, लालच और अनियंत्रित निर्माण से तोड़ा है। आज जो विनाश दिख रहा है, वह केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि हमारी नैतिक असफलता का परिणाम है। हमने सिर्फ जंगल नहीं काटे, हमने सदियों का विश्वास और भविष्य भी छीन लिया।

धराली गांव की हालिया तबाही इसका ताज़ा उदाहरण है। वहां जब सैलाब आया, तो उसकी आवाज़ इतनी भयानक थी कि लोगों को संभलने का मौका भी नहीं मिला। गांव अब मलबे के नीचे है, और अनुमान है कि जानें भी कहीं ज़्यादा गई हैं।

एक समय था जब इस क्षेत्र में पेड़ काटने, नदी किनारे निर्माण करने या निजी घर बनाने पर सख़्त पाबंदियां थीं। लेकिन अलग राज्य बनने के बाद, बाहरी निवेश और केंद्रीय अनुदानों के नाम पर अंधाधुंध निर्माण और संसाधनों की लूट शुरू हो गई। ठेकेदार, अफसर और नेताओं का गठजोड़ बन गया, और देवभूमि धीरे-धीरे विकास के नाम पर विनाश की ओर बढ़ती गई।

Editorial : भारतीय डाकघरों में लंबी कतारों के पीछे के कारण

उत्तराखंड की हर त्रासदी एक चेतावनी है—अब भी समय है संभलने का। यदि हमने हिमालय के साथ खिलवाड़ बंद नहीं किया, तो आने वाली पीढ़ियों को हम केवल मलबे और यादें ही सौंप पाएंगे।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button