Editorial : प्रकृति के साथ सामंजस्य और विकास
Editorial: Harmony and development with nature

Editorial : जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, अति-दोहन और भूमि उपयोग परिवर्तन जैसी व्यापक समस्याएं जैव विविधता में गिरावट का कारण बन रही है। सुंदरबन जैसे मैंग्रोव वन समुद्र-स्तर में वृद्धि, कीचड़ की कमी और सिकुड़ते पर्यावासों जैसे ‘तिहरे खतरेÓ का सामना कर रहे हैं। जंगलों में आग के कारण जंगल और जैवविविधता प्रभावित हो रही है।
पृथ्वी पर सबसे अधिक जैव विविधता वाले स्थानों में से कुछ पारिस्थितिकी तंत्रों की एक श्रृंखला है, जिनमें से प्रत्येक में समृद्ध वनस्पति और जीव हैं। इन जैव विविधता वाले हॉटस्पॉट में, अनगिनत प्रजातियां जटिल पारिस्थितिक तंत्र में सह-अस्तित्व में रहती हैं, जिनमें से प्रत्येक अपने संबंधित पारिस्थितिकी तंत्र के नाजुक संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
भारत में 45, 000 से अधिक पौधों की प्रजातियां और 90, 000 से अधिक पशुओं की प्रजातियां हैं, जिनमें बंगाल टाइगर और भारतीय हाथी जैसे प्रतिष्ठित जीव भी शामिल हैं। जंगल और घास के मैदान प्राकृतिक फिल्टर के रूप में कार्य करते हैं, जो हमारी हवा और पानी को शुद्ध करते हैं। विविध पारिस्थितिकी तंत्र मिट्टी की उर्वरता में योगदान करते हैं और मिट्टी के कटाव को रोकते हैं।
मधुमक्खियों और तितलियों जैसे कीट परागणकर्ता हमारी फसलों की सफलता सुनिश्चित करते हैं, जबकि अनगिनत अन्य प्रजातियां खाद्य श्रृंखला की नींव बनाती हैं, जो पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखती है। जैव विविधता के मुद्दों के बारे में लोगों में जागरूकता और समझ बढ़ाने तथा धरती पर मौजूद जंतुओं और पौधों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए प्रतिवर्ष 22 मई को एक खास थीम के साथ अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस मनाया जाता है।
Editorial : तपती गर्मी-सावधानी और संवेदनशीलता की ज़रूरत
अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस का इस वर्ष का विषय है ‘प्रकृति के साथ सामंजस्य और सतत विकासÓ, जो न केवल पर्यावरण संरक्षण की वैश्विक प्रतिबद्धताओं को रेखांकित करता है बल्कि जैव विविधता और सतत विकास के बीच गहरे अंतर्संबंध को भी उजागर करता है। भारत में जैव विविधता के नुकसान से निपटने के लिए स्पष्ट बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है। जैव विविधता संरक्षण प्रयासों में मूल कारणों का समाधान होना चाहिए और यह स्थानीय समुदायों को शामिल करके ही किया जाना चाहिए।

