Editorial : सख्त फैसले का वक्त

Editorial : Time for tough decisions

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Editorial : जम्बू -कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल को पाकिस्तानी आतंकवादियों ने जिस तरह निर्दोष पर्यटकों का नरसंहार किया वह मानवता के खिलाफ है। इस हिंसा में 26 लोगों की मौत हुई और कई घायल हुए। आतंकवादियों ने सिर्फ हिंदुओं को निशाना बनाया और उनका धर्म पूछ कर उन्हें गोलीबारी मारी। हालांकि की कश्मीर में इस नरसंहार को लेकर काफी गुस्सा देखा जा रहा है।

पहलगाम में हिंदुओं के साथ विदेशी नागरिक और नेवी में कार्यरत जवान की भी मौत हुईं है। जोड़ा शादी के बाद हनीमून मानाने गया था जो निर्मम आतंकी साजिश का शिकार हुआ है। नरसंहार के बाद भारतीय सेना के लोगों के पहुंचने के बाद भी लोग इतने दहशत में थे कि उन्हें भी आतंकी समझ लिया।

इस घटना में केंद्र और राज्य सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। भारत में हिंदुओं पर हिंसक हमले इस्लामिक आतंकवाद की एक सोची समझी रणनीति है। पाकिस्तान, बांग्लादेश में हिंदुओं का सफाया हो रहा है जबकि अफगानिस्तान में हिंदुओं की आबादी गिनती पर आ गईं है।

भारत में इस तरह के सामुदायिक और धार्मिक दंगे भड़काने के लिए पाकिस्तान मूल रूप से जिम्मेदार है। लेकिन हम इस तरह की बात कर अपनी जिम्मेदारी से बच भी नहीं सकते हैं। आतंकवादियों ने पुलवामा जैसी घटनाओं को अंजाम दिया है। कश्मीर में साल 2019 के बाद धारा 370 लागू होने के बाद यह पहली सबसे बड़ी आतंकी नरसंहार की घटना है।

दूसरा समझे अहम कारण कश्मीर के राजनैतिक और अलगाववादी कभी शान्ति और विकास नहीं चाहते हैं। क्योंकि धारा 370 खत्म होने के बाद उनकी तमाम स्वतंत्रता जहाँ बाधित हुईं वहीं आर्थिक नुकसान हुआ है। भारत के पड़ोसी इस्लामिक देश में हिंदुओं की स्थिति बद से बदतर है। जबकि ये कभी भारत के हिस्सा थे।

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यहाँ हिंदुओं पर लगातार धार्मिक उत्पीड़न और हिंसा की घटनाएं भारत की चिंता को बढ़ा दिया है। आतंकवाद से लड़ रहे भारत के सामने सामुदायिक हिंसा की घटनाएं बड़ी चुनौती बन रहीं हैं। सबसे अहम मुद्दा यह है कि अपने देश में ही हिंदू बाहुल्य होने के बाद भी हिंदू सामुदायिक हिंसा का शिकार बन रहा है।

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