Editorial : अब निर्णय का समय
Editorial: Now is the time for decision

Editorial: भारत को अब दो टूक निर्णय लेने की ज़रूरत है। कश्मीर में आतंक का सामना केवल पुलिस नहीं कर सकती, इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए। अलगाववाद की नर्म परतों को उखाड़ फेंकना होगा। धार्मिक पहचान के नाम पर फैलाई जा रही न$फरत को सामाजिक स्तर पर भी चुनौती देनी होगी।
इसके साथ-साथ, हमें यह तय करना होगा कि कश्मीर में पर्यटन केवल ‘स्वर्ग’ दिखाने का सौदा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता का सेतु है-और इस सेतु की रक्षा हम सबकी जिम्मेदारी है। पहलगाम का हमला हमें एक बार फिर झकझोर गया है।
यह पहला हमला नहीं है और शायद आखिरी भी नहीं। लेकिन अगर हम अब भी नहीं जागे तो दुश्मन की जीत सुनिश्चित है। हमें एक ऐसे भारत की आवश्यकता है जो जातियों धर्मों और मतभेदों से ऊपर उठकर आतंकवाद को पहचान सके और उसका सामना कर सके। राजनीतिक मतभेद रखें लेकिन राष्ट्रीय मुद्दों पर एकजुट रहें। आलोचना करें, पर लक्ष्य सही चुनें।
आतंकवादी की गोलियों पर चुप्पी और प्रधानमंत्री पर शोर-यह आत्मघात है। पहलगाम हमला हमारे लिए एक चेतावनी है-अगर अब भी हम नहीं जागे, तो अगला निशाना कोई और नहीं, हम स्वयं होंगे। और तब शायद हमें यह कहने का भी वक्त न मिले कि काश हमने समय रहते सही दुश्मन पहचाना होता।
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अभी-अभी जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में जो आतंकवादी हमला हुआ, उसने फिर से हमें यह याद दिला दिया कि असली दुश्मन हमारे भीतर नहीं, सरहद पार बैठा है। यह हमला एक साजि़श नहीं, बल्कि जिहादी विचारधारा की वह रक्तरंजित अभिव्यक्ति है, जो बीते कई दशकों से भारत को खून में डुबोने की फिराक में है।
निर्दोष नागरिक मारे गए, सुरक्षा बल घायल हुए, और एक बार फिर टीवी चैनलों पर वही पुराने दृश्य लौट आए-रोती हुई आंखें, खून से सना ज़मीन का टुकड़ा और राजनीतिक दलों की रस्मी प्रतिक्रियाएं।



