Editorial : राष्ट्र निर्माण की एक जटिल चुनौती

Editorial: A complex challenge of nation building

Editorial: A complex challenge of nation building
Editorial: A complex challenge of nation building

Editorial : आज भारत ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ शासन की बागडोर केवल प्रशासन तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि राष्ट्र के पुनर्निर्माण की दिशा तय करना भी इसका अहम हिस्सा बन जाता है। यह काम आसान नहीं है। एक ओर गांधी जी की सोच थी, जो भारत को उसकी सांस्कृतिक और सामाजिक जड़ों से जोड़कर आगे बढ़ाने की बात करती थी, वहीं दूसरी ओर पंडित नेहरू की सोच थी, जो आधुनिकता और पश्चिमी विचारों की ओर झुकी हुई थी।

आज जब हम भविष्य की ओर देख रहे हैं, तो ज़रूरत है कि हम इतिहास के बोझ से बाहर निकलकर मानवतावादी दृष्टिकोण अपनाएं। यह दृष्टिकोण एकतरफा नहीं हो सकता – इसे सभी समुदायों द्वारा मिलकर अपनाना होगा। मुस्लिम समाज को यह समझना होगा कि भारत एक हिन्दू बहुल देश है, लेकिन यहाँ हर धर्म को पूरी आज़ादी है। साथ ही, यह भी जरूरी है कि किसी भी धार्मिक समुदाय के रीति-रिवाज़ों के पालन में बाधा न बने।

गांधी जी का ग्राम स्वराज का सपना, जिसमें स्थानीय पंचायतें शासन की आधारशिला होतीं, उसे हमने पश्चिमी स्थानीय शासन की नक़ल बनाकर छोड़ दिया। हालाँकि 73वें संविधान संशोधन ने पंचायतों को संवैधानिक दर्जा दिया, पर वे अब भी ज़मीन से जुड़ी हुई नहीं दिखतीं वे ऊपर से थोपे गए ढाँचे जैसी बनी हुई हैं। गांधी जी की सोच थी कि भारत को उसकी विशेषताओं के अनुरूप शासन प्रणाली अपनानी चाहिए न कि पश्चिमी मॉडल की नकल करनी चाहिए।

धर्मनिरपेक्षता इस देश के सामने दूसरी बड़ी चुनौती है। भारत जैसे विविध धार्मिक समाज में धर्मनिरपेक्षता का मतलब केवल “सर्व धर्म समभाव” हो सकता है। पूरी तरह धर्म मुक्त शासन यहाँ संभव नहीं है। बाबा साहेब अंबेडकर ने भी संविधान में ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द नहीं जोड़ा था – यह बाद में आपातकाल के दौरान शामिल किया गया।

आज धर्मनिरपेक्षता के नाम पर जब धर्मांतरण को खुली छूट दी जाती है, तो यह भारतीय परंपरा और सामंजस्य को नुकसान पहुंचाता है। भारतीय संस्कृति में हर धर्म का सम्मान करने की भावना है, जबकि अब्राह्मिक परंपराओं में धर्मांतरण को एक धार्मिक कर्तव्य माना जाता है। भारतीय सोच में किसी को उसका धर्म छोड़ने या दूसरों का धर्म बदलवाने को गलत माना गया है क्योंकि यह सामाजिक संतुलन को बिगाड़ता है।

Editorial : बदलाव की ओर हरियाणा

आज समय आ गया है कि हम धर्मनिरपेक्षता को केवल एक वैचारिक नारा न मानें, बल्कि उसे भारतीय दृष्टिकोण से व्याख्यायित करें – जहाँ हर धर्म को समान सम्मान मिले, लेकिन कोई भी किसी दूसरे की आस्था में बाधक न बने।

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