Editorial : किसान क्रेडिट सीमा बढ़ाने की मांग

Editorial: Demand to increase farmer credit limit

Editorial : किसानों को अगर सही तरीके से औपचारिक कर्ज सही वक्त पर दीर्घकालिक अवधि के लिए मिले तो उसकी जिंदगी में महत्वपूर्ण बदलाव आ सकता है। कुछ अन्य अध्ययन भी बताते हैं कि अगर किसानों को समय पर दीर्घकालिक और औपचारिक कर्ज मिलता है तो उसकी खेती को जरूरतों को पूरा करने में उसे मदद मिलती है। इससे उसकी उत्पादकता बढ़ने की गुंजाइश बढ़ जाती है।

किसान की उपज बढ़ जाती है, फसल तैयार भी हो जाती है, लेकिन उसे बेचने के लिए सही बाजार तक पहुंच के लिए रकम नहीं होती तो उसे अपनी फसल और उपज औने-पौने दामों में बेचनी पड़ती है। भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार, देश की कुल जनसंख्या का 46.1 प्रतिशत हिस्सा खेती-किसानी और उससे जुड़े कार्यों से अपनी रोजी-रोटी चलाता है। हालांकि कुछ जानकारों का मानना है कि यह संख्या और भी ज्यादा हो सकती है।

सरकार के ही आंकड़ों के अनुसार देश के 12 करोड़ किसान परिवार सीमांत हैं। इनमें करीब 35 प्रतिशत की जोत 0.4 हेक्टेयर से कम है, जबकि 69 प्रतिशत किसानों के पास एक हेक्टेयर से कम जमीन है। आंकड़ों के अनुसार देश के 82 प्रतिशत किसान छोटे या सीमांत हैं। जिनकी जोत 0.4 हेक्टेयर से कम है, उनकी खेती से सालाना आमदनी आठ हजार रूपए के आसपास है। घरेलू स्तर के आंकड़ों के जरिए कृषि में उत्पादकता और उसके जोखिम के साथ ही कृषि ऋण के प्रभाव का आकलन भी किया गया था।

इस आकलन के नतीजे बताते हैं कि अगर किसानों को समय पर उचित कर्ज मिलता है तो उससे उसकी उत्पादकता में 24 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दिखने लगती है। इससे किसानों को होने वाले नुकसान का जोखिम 16 फीसद तक कम हो जाता है।

बहरहाल कृषि पर निगाह रखने वाले स्वतंत्र विचारक भी मानते हैं कि किसानों के लिए अल्पकालिक की तुलना में दीर्घकालिक ऋण अधिक प्रभावी है। इसीलिए जानकार मानते हैं कि मौजूदा जलवायु परिवर्तन से आसन्न संकट के दौर में किसानों को मौसम के साथ अनुकूलन और उस लिहाज से अपनी खेती को ढालने के लिए ऐसी कृषि केंद्रित वित्त योजनाओं की जरूरत ज्यादा है।

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