Editorial : भारत की वर्तमान चुनावी प्रणाली
Editorial : Current electoral system of India

Editorial : भारत के लोकतंत्र की मजबूती एवं चुनावी प्रक्रिया को अधिक प्रासंगिक एवं कम खर्चीला बनाने के लिये ‘एक देश एक चुनाव’ पर चर्चा होती रही है। भारत की वर्तमान चुनावी प्रणाली में निहित कई चुनौतियों का समाधान करने के लिए ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ की अवधारणा एक संभावित समाधान के रूप में उभरी है।
विगत लोकसभा चुनावों में कुल सरकारी खर्च 6600 करोड़ रुपये आया था जो भारत जैसे विविधतापूर्ण विशाल देश को देखते हुए भले ही जायज कहा जाये, लेकिन बार-बार होने वाले चुनावों से होने वाले ऐसे भारी-भरकम खर्चे देश की अर्थ-व्यवस्था पर बोझ तो डालते ही है। हाल में संपन्न लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा द्वारा जारी चुनाव घोषणापत्र में उसने ‘एक देश, एक चुनाव’ को प्रमुख वादों के रूप में शामिल किया था।
भारत में भ्रष्टाचार की जड़ भी महंगी होती चुनाव व्यवस्था है क्योंकि जब करोड़ों रुपये खर्च करके कोई विधानसभा या लोकसभा का प्रत्याशी जनप्रतिनिधि बनेगा तो वह विजयी होने के बाद सबसे पहले अपने भारी खर्च की भरपाई करने की कोशिश करेगा। पारदर्शी व निष्पक्ष चुनाव के लिये एक साथ चुनावी मशीनरी तथा सुरक्षा बलों की उपलब्धता के यक्ष प्रश्न को भी सामने रखकर इस पर सकारात्मक रूख अपनाना चाहिए और इसके सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए आम सहमति बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए।
Editorial : आतिशी दिल्ली की तीसरी महिला मुख्यमंत्री बनेंगी
असल में बात सम्पूर्ण चुनावी व्यवस्था के सुधार की होनी चाहिए। मगर इसकी बात करते हुए सभी राजनैतिक दलों के सामने निजी हित एवं चुनाव जीतने का गणित सामने आ जाता है। भारत की असली विडम्बना यही है। जब भी सरकारी खर्चे से चुनाव कराने की बात होती है तो इस राह को अव्यावहारिक बता दिया जाता है।



