सही सोच व मार्गदर्शन से अभावों को भी विशेषता में बदला जा सकता है

With the right thinking and guidance, deficiencies can also be converted into specialties.

Government schemes to help the visually impaired
Government schemes to help the visually impaired

भगवान द्वारा दिया गया सबसे कीमती उपहार इस रंगीन और खूबसूरत दुनिया को देखने की क्षमता है। अफसोस की बात है कि दुनिया में हर कोई इसे नहीं देख सकता। नेत्रहीन एवं आंशिक दृष्टि वाले लोगों के लिए ब्रेल लिपि किसी चमत्कार से कम नहीं है। ब्रेल एक स्पर्शनीय लेखन (braille a tactile writing) ढांचा है जो नेत्रहीन और आंशिक दृष्टि वाले लोगों को उभरे हुए बिंदुओं का उपयोग करके स्पर्श द्वारा पढ़ने की अनुमति देता है। ब्रेल पाठकों की लिखित शब्द तक उतनी ही पहुंच होती है, जितनी कि देखे गए पाठकों की होती है और वे अपने शेष जीवन के बारे में पढ़ सकते हैं।

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक विश्व भर में करीब 39 मिलियन लोग देख नहीं सकते जबकि 253 मिलियन लोगों में कोई न कोई दृष्टि विकार है।दुनिया भर में लगभग 2.2 बिलियन लोगों को निकट या दूर दृष्टि दोष है।ब्रेल लिपि आज पूरी दुनिया में इस्तेमाल हो रही है। दृष्टि बाधित दोष कुछ व्यक्तियों में जन्मजात पाया जाता है इसके अलावा कुछ व्यक्तियों में यह दोष किसी बिमारी जैसे रेटिनाइटिस पिगमेंटसा, ग्लूकोमा इत्यादि बीमारियों के कारण भी हो सकता है। रेटिनाइटिस पिगमेंटसा (Retinitis Pigmentosa) एक प्रकार की वंशानुगत दृष्टिबाधित बीमारी है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में परिवर्तित हो जाती है। इसके कारण व्यक्ति अपनी आंखों की रोशनी पूरी तरह से खो देता है। वर्तमान संदर्भ में देखा जाए तो इस बीमारी का कोई स्थाई इलाज नहीं है।

प्रकृति की ओर से विशेष हुनर उत्पन्न होता है

नेत्रहीनता अथवा अन्य प्रकार की अपंगता के बाद किसी भी व्यक्ति में स्वत: प्रकृति की ओर से विशेष हुनर उत्पन्न होता है। इसके बल पर वह भी स्वयं को आम लोगों की तरह विकास की मुख्यधारा से जोड़ पाता है।अभी हाल ही में मुझे दृष्टिहीन बच्चों को नजदीकी से जानने का अवसर प्राप्त हुआ।दिनांक 21 से 25 फरवरी 2023 तक एससीईआरटी दिल्ली तथा शिक्षा निदेशालय दिल्ली के तत्वावधान में ”द ब्लाइंड रिलीफ एसोसिएशन” दिल्ली में पंच दिवसीय व्यक्तिगत प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया।जिसमें शिक्षा विभाग दिल्ली के 30 स्पेशल एजुकेशन शिक्षकों ने भाग लिया। विशेष शिक्षिका होने के नाते मेरा मानना था कि दृष्टिहीन व्यक्तियों की जिंदगी बहुत मुश्किल भरी होती है परंतु इस कार्यशाला में मैंने जाना कि ऐसे विशेष बच्चों के लिए जिंदगी में कुछ भी करना असंभव नहीं है। उनके अंदर कुछ भी कर गुजरने का हौसला है एक जुनून है।

The Blind Relief Association

‘द ब्लाइंड रिलीफ एसोसिएशन’ (The Blind Relief Association) द्वारा जेपीएम सीनियर सेकेंडरी स्कूल जो कि विशेष रूप से दृष्टिहीन छात्रों के लिए चलाया जा रहा है इसमें संपूर्ण नॉर्थ भारत के 205 छात्र वर्तमान में अध्ययनरत हैं। सभी छात्र यहां पर कक्षा 12वीं तक की पढ़ाई पूरी करते हैं इनमें से अधिकतर कोई आईएएस, आईपीएस,डीएम,शिक्षक और बड़े- बड़े अपने सपने पूरे करने के लिए जी जान से संघर्ष भरी जिंदगी में खुशी खुशी सफलता की ओर अग्रसर हैं। कुछ छात्र विशेष खेलों में ओलंपिक तक का सफर भी पार कर चुके हैं।

शुरुआती दौर में जहां बच्चे अपनी पढ़ाई ब्रेल हिंदी तथा अंग्रेजी में एवं मैथ के लिए टेलर फ्रेम का उपयोग करके सीखते हैं वहीं बच्चे उच्च कक्षाओं में अलग-अलग कंप्यूटर सॉफ्टवेयर की सहायता से पढ़ाई करते हैं। लिहाजा ऐसे विशेष छात्रों के लिए कंप्यूटर सॉफ्टवेयर जैसे JAWS,NVDA,SCREEN READER,MAGIC,ZOOM इत्यादि भी इनके दैनिक जीवन में लाभदायक सिद्ध हो रहे हैं। विशेषतया ये बच्चे मोबाइल का प्रयोग करने के लिए टॉक बैक का उपयोग करते हैं।

‘BE MYE EYE’ एप्प

‘BE MYE EYE’ इस एप्प की सहायता से आप किसी भी दृष्टिहीन व्यक्ति की कभी भी सहायता कर सकते हैं। इस ऐप पर 5 लाख दृष्टिहीन व्यक्ति और 63 लाख वॉलिंटियर्स इनकी सहायता के लिए पंजीकृत है। दृष्टिहीन व्यक्ति किसी भी सहायता के लिए इस ऐप के माध्यम से किसी भी वॉलिंटियर्स के पास कॉल कर सकता है और उस व्यक्ति का नाम और पता गोपनीय रहता है।दृष्टिहीन व्यक्ति के मोबाइल फोन का बैक कैमरा ऑन रहता है जिससे वह वॉलिंटियर्स की सहायता ले सकता है।

इस ऐप्प की सहायता से कोई भी दृष्टिबाधित व्यक्ति सड़क पार करने के लिए, कुछ पढ़ने के लिए और किसी रुपए- नोट की पहचान के लिए वह वॉलिंटियर्स मदद ले सकता है। किसी भी दृष्टिबाधित व्यक्ति को एड और अप्लायंसेज उपकरण की आवश्यकता है तो आप द ब्लाइंड रिलीफ एसोसिएशन दिल्ली मैं एक प्रार्थना पत्र देकर उसे प्राप्त कर सकते हैं। आज के समय में जरूरतमंद दृष्टिबाधित की सहायता के लिए बहुत सारे एनजीओस आगे आए हैं,जो समय-समय पर जरूरतमंदों की सहायता कर रहे हैं।

इस संस्था की एक खास बात यह है कि कोई भी दृष्टिहीन व्यक्ति छात्र यहां पर मुफ्त में पढ़ाई कर सकता है तथा रहना खाना-पीना पुस्तकें सब कुछ मुफ्त में प्राप्त होती है। किसी के लिए कोई भी शुल्क देय नहीं है।यदि दृष्टिहीनों को समान अवसर तथा प्रभावी पुनर्वास की सुविधा मिले तो वे बेहतर गुणवत्तापूर्ण जीवन व्यतीत कर सकते हैं।

 दृष्टिबाधितों की मदद के लिए सरकारी योजनाएं

भारत में दृष्टिबाधितों की मदद के लिए बहुत-सी सरकारी योजनाएं संचालित हो रही हैं।दृष्टिबाधित व्यक्तियों को स्पर्श करके शब्दों को पहचानने में मदद मिलती है।उन्हें स्पर्श करना आसान बनाने के लिए, बिंदुओं को थोड़ा उभारा जाता है।दृष्टिबाधित व्यक्ति ब्रेल प्रणाली को अक्षरों से शुरू करके सीखते हैं, फिर विशेष वर्णों और अक्षरों के संयोजन की जानकारी दी जाती है। सीखने के तरीके स्पर्श से पहचान पर निर्भर होते हैं। हर वर्ण को याद रखना होता है। ब्रेल लिपि को हाथ से या मशीन से बनाया जा सकता है।टाइपराइटर जैसे उपकरण और प्रिंटिंग मशीनें अब विकसित हो चुकी हैं।ब्रेल प्रणाली का उपयोग करके कई भारतीय भाषाओं को पढ़ा जा सकता है।

ब्रेल लिपि के आविष्कार के बाद विश्वभर में नेत्रहीन, दृष्टिहीन या आंशिक रूप से नेत्रहीन लोगों की जिंदगी बहुत हद तक आसान हो गई।इसकी सहायता से ऐसे कई लोग अपने पैरों पर खड़े हो सके।इस लिपि के आविष्कार ने दृष्टिबाधित लोगों की शिक्षा में क्रांति ला दी है। शिक्षा,अभिव्यक्ति और विचारों की स्वतंत्रता के साथ-साथ दृष्टिहीन व्यक्तियों के सामाजिक समावेश के लिए ब्रेल लिपि काफी सहायक है।लुइ ब्रेल को दिखाई नहीं देता था, लेकिन फ़िर भी उन्होंने पूरे दृष्टिबाधित समुदाय के लिए बहुत बड़ा उपकार किया ताकि वे भी स्वयं पर आश्रित हो, उन्हें दूसरों का सहारा न लेना पडे। ऐसे में मेरा मानना है कि दृष्टिहीन होना कोई अभिशाप नहीं है, क्योंकि शारीरिक अभावों को यदि प्रेरणा बना लिया जाये तो दिव्यांगता व्यक्तित्व विकास में सहायक हो जाती है।यदि सोच सही रखी जाये तो अभाव भी विशेषता बन जाते हैं।

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दिव्यांग व्यक्ति अपने अभावों में भी स्वयं को कमजोर नहीं होने देते, वे अपना मार्ग स्वयं प्रशस्त करते हैं और दिव्यांगता को अपनी मजबूरी नहीं बनने देते, मूक होकर भी सब कुछ बोल जाते हैं, बधिर होकर सब सुन लेते हैं, दृष्टिहीन होकर भी स्पष्ट देख लेते हैं,पंगु होकर भी जो जिन्दगी की दौड़ में आगे निकल जाते हैं। ऐसे दिव्यांगो की कर्मठता के आगे हम स्वयं का आंकलन भी नहीं कर पाते हैं। नतमस्तक हैं हम उनके प्रति जो हमें जिन्दगी का पाठ सिखाते हैं। स्वस्थ शरीर के बावजूद बहुत से व्यक्ति अधूरे ही होते हैं और दिवयांग तन-मन से सम्पूर्ण होते है।

मोनिका शर्मा
विशेष शिक्षा अध्यापिका
दिल्ली

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