Landslide in Joshimath : भूस्खलन से जोशीमठ त्रासदी के मुहाने पर

Joshimath Sinking

Landslide in Joshimath : कुछ समय से जोशीमठ में भू धंसने की गति अचानक तेज हो गई है। जमीन के धंसने से समूचा जोशीमठ धंस रहा है। सैकड़ों भवन रहने लायक नहीं बचे हैं। कई जगह जमीन पर भी चौड़ी दरारें उभरने लगी हैं। कुछ स्थानों पर जमीन फटने से पानी बाहर निकल रहा है। भारत की चार सर्वोच्च धार्मिक पीठों में से एक ज्योतिर्पीठ की दीवारों पर भी दरारें आ गई हैं। धार्मिक,पौराणिक एवं ऐतिहासिक नगर जोशीमठ भू-धंसाव के कारण इस साल की सबसे बड़ी त्रासदी झेल रहा है। उत्तराखंड के जोशीमठ शहर में भू धंसाव की त्रासदी को लेकर हर तरफ चिंता है।

जोशीमठ में भू धंसाव किसी बड़ी अनहोनी की ओर इशारा कर रहा है। इस ऐतिहासिक शहर में पड़ी दरारें, इस बात की गवाह हैं कि हालात ठीक नहीं। भू-धसाव की वजह से जोशीमठ के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लग गया है।शहर के विभिन्न वार्डो में हो रहे भू-धसाव नें शहर की खुशियाँ छीन ली है। मकानों में पडी दरारों नें नगरवासियों का सुख चैन छीन लिया है। लोगों के आंसुओ से बह रही अविरल आंसुओ की धारा सबकुछ बंया करने के लिए काफी है। चारों ओर एक अजीब सा सन्नाटा कचोट रहा है। अपने जीवनभर की मेहनत की कमाई को अपने घर बार और मकान में लगाने के बाद आज इनके घर सुरक्षित नहीं रह गये हैं।

Joshimath Sinking : खेत- खलिहान से लेकर मकान सबकुछ भू-धसाव की चपेट में आ चुके हैं। भू-धसांव के कारण नगर के वाशिंदे माघ माह की इन सर्द/ठंड रातों में अपने भविष्य को लेकर आशांकित है।शहर के लोगों के माथे पर पडी चिंता की लकीरें, बेबस व लाचार आंखे बेहद पीड़ादायक है।वहीं प्रशासन के राहत बचाव कार्य संतोष जनक नहीं हैं,जिससे प्रभावितों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है,उन्हें इस भारी ठंड में भी किसी अनहोनी के भय से रात घर से बाहर गुजारनी पड़ रही है।लिहाजा चिंता की बात है कि भारत की इस अंतिम सरहदी शहर में भू-धंसाव का आकार दिन प्रतिदिन सुरसा राक्षसी की मुंह के समान निरन्तर बढ़ता ही जा रहा है। इसके घरों, सड़कों तथा खेतों में बड़ी-बड़ी दरारें आ गईं हैं।

हालांकि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी (Chief Minister Pushkar Singh Dhami) ने जोखिम वाले घरों में रह रहे 600 परिवारों को तत्काल अन्यत्र भेजे जाने का आदेश दिया है। अब पीएमओ भी मामले की निगरानी कर रहा है, लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि आखिर जोशीमठ में यह भू धंसाव की स्थिति उत्पन्न कैसे हुई ? और इस त्रासदी के लिए जिम्मेदार कौन है? स्थानीय लोगों में सरकार के खिलाफ भारी आक्रोश है। स्थानीय लोग इमारतों की खतरनाक स्थिति के लिए मुख्यतः राष्ट्रीय तापविद्युत निगम लिमिटेड (एनटीपीसी) की तपोवन -विष्णुगढ़ परियोजना को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।

‘जोशी मठ बचाओ’ संघर्ष समिति के संयोजक अतुल सती ने कहा, हम पिछले 14 महीनों से अधिकारियों का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन हमारी बात पर ध्यान नहीं दिया गया। अब जब स्थिति हाथ से निकल रही है तो वे चीजों का आकलन करने के लिए विशेषज्ञों की टीम भेज रहे हैं। उन्होंने कहा, “अगर समय रहते हमारी बात पर ध्यान दिया गया होता तो जोशीमठ में हालात इतने चिंताजनक नहीं होते।”

विख्यात स्विश भू-वैज्ञानिक अर्नोल्ड हीम और सहयोगी आगस्टो गैस्टर ने सन् 1936 में मध्य हिमालय की भूगर्भीय संरचना पर जब पहला अभियान चलाया था तो उन्होंने अपने यात्रा वृतान्त ‘‘द थ्रोन ऑफ द गॉड (1938) और शोध ग्रन्थ ‘सेन्ट्रल हिमालया जियॉलॉजिकल आबजर्वेशन्स ऑफ द स्विश एस्पीडिशन’ 1936 (1939) में टैक्टोनिक दरार, मुख्य केन्द्रीय भ्रंश (एमसीटी) की मौजूदगी को चिन्हित करने के साथ ही चमोली गढ़वाल के हेलंग से लेकर तपोवन तक के क्षेत्र को भूगर्भीय दृष्टि से संवेदनशील बताया था। ये ग्रन्थ भू-वैज्ञानिकों के लिए बाइबिल से कम नहीं हैं। इन्हीं के आधार पर मध्य हिमालय के भूगर्भ पर शोध और अध्ययन आगे बढ़ा। आज भू-धंसाव के कारण अस्तित्व के संकट में फंसा जोशीमठ (ज्योतिर्मठ) ठीक तपोवन और हेलंग के बीच ही है।

इसके बाद 1976 में मिश्रा कमेटी ने भी अध्ययन कर जोशीमठ को संवेदनशील घोषित कर उपचार के सुझाव दिए थे।पिछले ही साल उत्तराखण्ड सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग ने भी जोशीमठ पर मंडराते खतरे की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित किया था। इन तामम चेतावनियों के बाद जोशीमठ को बचाने के प्रयास तो हुए नहीं अलबत्ता वहां भारी भरकम इमारतों का जंगल उगता गया। बढ़ती आबादी द्वारा उपयोग किया हुआ पानी जोशीमठ के गर्भ में उतरता गया। आज उसी दलदल पर असह्य बोझ तले दबा जोशीमठ नीचे अलकनन्दा की ओर फिसलता जा रहा है।

स्वयं शंकराचार्य अभिमुक्तेश्वरानन्द स्थिति को देख कर विचलित हैं। यह भारत-चीन सीमा के निकट देश के अंतिम शहर के धंसने का साफ संकेत है। भूवैज्ञानिक पहले ही इस शहर को तत्काल खाली कराने की चेतावनी देते रहे हैं। उत्तराखण्ड सरकार तब जाग रही है, जब यह शहर अपनी कब्र के करीब पहुंच गया है। भारत सरकार के कानों पर तो अभी भी जूं तक नहीं रेंगती दिखाई नहीं दे रही।

Defense of Sanatan Dharma by Adiguru Shankaracharya : जोशीमठ कोई साधारण शहर नहीं है। यह आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा सनातन धर्म की रक्षा के लिए देश के चार कोनों में स्थापित चार सर्वोच्च धार्मिक पीठों में से एक, ज्योतिर्पीठ है। यह उत्तराखण्ड की प्राचीन राजधानी है, जहां से कत्यूरी वंश ने शुरू में अपनी सत्ता चलाई थी। यही से सर्वोच्च तीर्थ बदरीनाथ की तीर्थ यात्रा की औपचारिकताएं पूरी होती हैं। शंकराचार्य की गद्दी यहीं बिराजमान रहती है। फूलों की घाटी और नन्दादेवी बायोस्फीयर रिजर्व का बेस भी यही नगर है। हेमकुंड यात्रा भी यहीं से नियंत्रित होती है।

नीती-माणा दर्रों और बाड़ाहोती पठार पर चीनी हरकतों पर इसी नगर से नजर रखी जाती है। विदित है कि चीनी सेना
बार-बार बाड़ाहोती की ओर से घुसपैठ करने का प्रयास करती रहती है। उन पर नजर रखने के लिए भारत-तिब्बत सीमा पुलिस की बटालियन और उसका माउंटेंन ट्रेनिंग सेंटर यहीं है। यहीं पर गढ़वाल स्काउट्स का मुख्यालय और 9 माउंटेंन ब्रिगेड का मुख्यालय भी है। सीमांत जनपद चमोली का सरहदी ब्लॉक है। विश्व प्रसिद्ध हिम क्रीडा स्थल औली, आस्था का सर्वोच्च धाम श्री बदरीनाथ धाम, हेमकुंड साहिब और रंग बदलने वाली फूलों की घाटी का प्रवेश द्वार भी यहीं है।

हर साल देश विदेश से लाखों-लाख तीर्थयात्री और पर्यटक यहां पहुंचते है। पंच प्रयाग में से प्रथम प्रयाग इसी के मुहाने पर धौली गंगा और अलकनंदा का संगम विष्णुप्रयाग स्थित है। एशिया का सबसे लम्बा रज्जू मार्ग इसी नगर के ऊपर से गुजरता है। मैं भगवान बदरीविशाल जी का शीतकालीन गद्दी स्थल भी ये ही है।पौराणिक नृसिंह मंदिर में 6 महीने भगवान बदरीविशाल जी की पूजा होती है। मंदिर के प्रांगण में प्रतिवर्ष बद्रीविशाल के कपाट खुलने से पहले पौराणिक तिमुंडिया कौथिग का आयोजन होता है।जोशीमठ महज एक नगर ही नहीं है अपितु धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र भी हैं।

जोशीमठ के सैकड़ों घर, अस्पताल सेना के भवन, मंदिर, सड़कें, प्रतिदिन धंसाव की जद में आती जा रही हैं। यह 20-25 हजार की आबादी वाला नगर, अनियंत्रित अदूरदर्शी विकास की भेंट चढ़ रहा है। एक तरफ तपोवन विष्णुगाड परियोजना की एनटीपीसी की सुरंग ने जमीन को भीतर से खोखला कर दिया है, दूसरी तरफ बायपास सड़क जोशीमठ की जड़ पर खुदाई करके पूरे शहर को नीचे से हिला रही है।

जोशीमठ की धारक क्षमता के विपरीत यहां अवैज्ञानिक तरीके से विकास होता रहा। जोशीमठ का समुचित मास्टर प्लान न होने के कारण उसकी ढलानों पर विशालकाय इमारतों का जंगल बे- रोक-टोक उगता जा रहा है। हजारों की संख्या में बनी इमारतों के भारी बोझ के अलावा लगभग 25 हजार घरों से उपयोग किया गया पानी स्वयं एक बड़े नाले के बराबर होता है जो कि जोशीमठ की जमीन के नीचे दलदल पैदा कर रहाहै। उसके ऊपर सेना और आइटीबीपी की छावनियों का निस्तारित पानी भी जमीन के नीचे ही जा रहा है।

निरन्तर खतरे के सायरन के बावजूद वहां आइटीबीपी ने भारी भरकम भवन बनाने के साथ ही मलजल शोधन संयंत्र नहीं लगाया। कई क्यूसेक यह अशोधित मलजल भी जोशीमठ के गर्भ में समा रहा है। यही स्थिति सेना के शिविरों की भी है। जोशीमठ के बचाव के बारे में अब सोचा जा रहा है, जबकि इस शहर का अस्तित्व ही संकट में पड़ गया।
यही मंगल कामना है कि भगवान बदरीविशाल जी की कृपा से इस शहर पर मंडरा रहे संकट के बादल जल्द ही दूर हो
जाएं।
डॉ.पवन शर्मा

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