भारत की विनिर्माण महत्वाकांक्षा को पूरा करने में कार्यबल उत्पादकता निभाएगी अहम भूमिका: KPMG रिपोर्ट

Workforce productivity will play a crucial role in realizing India's manufacturing ambitions: KPMG report

Workforce productivity will play a crucial role in realizing India's manufacturing ambitions: KPMG report
Workforce productivity will play a crucial role in realizing India’s manufacturing ambitions: KPMG report

जैसे-जैसे भारत 2047 तक 30 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, विनिर्माण क्षेत्र को विकास, रोजगार और प्रतिस्पर्धात्मकता के एक महत्वपूर्ण इंजन के रूप में काम करना होगा। हालांकि, 7.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के विनिर्माण क्षेत्र, जो सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 25 प्रतिशत का योगदान दे, के राष्ट्रीय लक्ष्य को हासिल करने के लिए उद्योग को काम करने के तरीकों, संगठनों की संरचना और प्रतिभाओं की तैनाती के तरीके में बुनियादी बदलाव करने होंगे।

केपीएमजी इन इंडिया की नवीनतम रिपोर्ट — ‘India’s Trillion-Dollar Manufacturing Ambition Requires a Workforce Productivity Revolution’ में कहा गया है कि कार्यबल उत्पादकता भारत के विकास के लिए सबसे कम उपयोग किए गए प्रमुख कारकों में से एक है और देश की विनिर्माण महत्वाकांक्षाओं को साकार करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।

यह रिपोर्ट भारत की 130 से अधिक बड़ी विनिर्माण कंपनियों पर किए गए शोध पर आधारित है और कार्यबल उत्पादकता, लाभप्रदता तथा उद्यम मूल्य सृजन के बीच संबंध को दर्शाती है। रिपोर्ट के निष्कर्ष बताते हैं कि भारत ने विनिर्माण क्षेत्र के विकास में महत्वपूर्ण प्रगति की है, लेकिन मौजूदा उत्पादकता स्तर आज के विनिर्माण उत्पादन और देश की 2047 की महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए आवश्यक पैमाने के बीच के अंतर को पाटने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

मौजूदा विकास दर को देखते हुए, भारतीय विनिर्माण क्षेत्र के 2047 तक केवल लगभग 2.7 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, जो 7.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के लक्ष्य से काफी कम है। रिपोर्ट में कार्यबल उत्पादकता को सबसे अधिक क्षमता वाला कारक बताया गया है, जो लंबे समय तक प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त बनाने में मदद कर सकता है। उत्पादकता में होने वाले सुधार संगठनों में स्थायी रूप से शामिल हो जाते हैं, जिससे हर वर्ष उत्पादन, लाभप्रदता और मजबूती में सुधार होता है।

रिपोर्ट में कई विनिर्माण संगठनों के सामने मौजूद “उत्पादकता के भ्रम” (Productivity Illusion) को भी रेखांकित किया गया है। इसमें काम की अधिक गतिविधि को अक्सर बेहतर प्रदर्शन समझ लिया जाता है। अत्यधिक प्रबंधन स्तर, बंटी हुई भूमिकाएं, कमजोर पर्यवेक्षण क्षमता, पारंपरिक या अनौपचारिक ज्ञान पर निर्भरता, संविदा कार्यबल की क्षमता में अंतर और अत्यधिक रिपोर्टिंग जैसी छिपी हुई अक्षमताएं परिचालन में किए जा रहे महत्वपूर्ण प्रयासों के बावजूद उत्पादन क्षमता, गुणवत्ता, मार्जिन और पूंजी पर रिटर्न को प्रभावित करती रहती हैं।

विनिर्माण क्षेत्र के नेतृत्वकर्ता जहां मार्जिन पर दबाव, भू-राजनीतिक अनिश्चितता, बदलती प्रतिस्पर्धात्मक परिस्थितियों और एआई के बढ़ते प्रभाव से जूझ रहे हैं, वहीं रिपोर्ट ‘प्रोडक्टिविटी ट्रायड’ (Productivity Triad) पेश करती है। यह एक व्यावहारिक ढांचा है, जिसके जरिए संगठन काम करने के तरीकों में नए सिरे से बदलाव, संगठनात्मक संरचना के पुनर्गठन और कार्यबल के पुनर्संयोजन के माध्यम से उत्पादकता बढ़ा सकते हैं। इसमें डिजिटल तकनीकों, एआई, प्रदर्शन प्रबंधन और संगठनात्मक संस्कृति की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।

केपीएमजी इन इंडिया में पार्टनर और ह्यूमन कैपिटल एडवाइजरी सॉल्यूशंस (HCAS) के प्रमुख, सुनीत सिन्हा ने कहा, “कार्यबल उत्पादकता भारत के विकास के लिए सबसे कम उपयोग किए गए प्रमुख कारकों में से एक है। विनिर्माण क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मकता के अगले दौर में केवल अधिक लोगों या परिसंपत्तियों को जोड़ने से सफलता नहीं मिलेगी, बल्कि काम करने के तरीकों में बुनियादी बदलाव करना होगा। जो संगठन अभी कदम उठाते हैं, वे महत्वपूर्ण मूल्य हासिल कर सकते हैं, विकास में तेजी ला सकते हैं, लाभप्रदता मजबूत कर सकते हैं और भारत की विनिर्माण यात्रा के अगले अध्याय को गति देने में योगदान दे सकते हैं।”

केपीएमजी इन इंडिया में पार्टनर, ह्यूमन कैपिटल एडवाइजरी सॉल्यूशंस (HCAS), शरद मलू ने कहा, “कई संगठन अभी भी उत्पादकता के भ्रम का सामना कर रहे हैं, जहां काम की अधिक गतिविधियां अंदरूनी अक्षमताओं को छिपा देती हैं। स्थायी उत्पादकता सुधार के लिए कंपनियों को अपनी संरचनाओं को सरल बनाने, फ्रंटलाइन क्षमताओं को मजबूत करने, महत्वपूर्ण ज्ञान को व्यवस्थित रूप से दर्ज करने और ऐसे कार्यबल मॉडल तैयार करने की आवश्यकता होगी, जो बदलती कारोबारी जरूरतों के अनुरूप ढल सकें। जो संगठन उत्पादकता में बदलाव के लिए व्यवस्थित दृष्टिकोण अपनाएंगे, वे प्रदर्शन और प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार के लिए बेहतर स्थिति में होंगे।”

रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष

  • भारत के विनिर्माण क्षेत्र को 2047 तक लगभग 15 गुना विस्तार करना होगा—मौजूदा लगभग 0.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 7.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक। इसके लिए लगभग 13 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि आवश्यक होगी, जो मौजूदा विकास दर से काफी अधिक है।
  • 130 से अधिक बड़ी विनिर्माण कंपनियों पर किए गए शोध से कार्यबल उत्पादकता और उद्यम मूल्य सृजन के बीच मजबूत सकारात्मक संबंध का पता चलता है। 90 प्रतिशत से अधिक कंपनियां उत्पादकता-मूल्य क्षेत्र (productivity-value zone) में आती हैं।
  • उत्पादकता के मामले में अग्रणी संगठनों ने दस वर्षों की अवधि में अपने समकक्ष संगठनों की तुलना में 50 प्रतिशत से अधिक लाभप्रदता वृद्धि और लगभग 2 गुना बाजार पूंजीकरण वृद्धि दर्ज की।
  • विनिर्माण कंपनियों के बीच उत्पादकता में 300 प्रतिशत से 1000 प्रतिशत तक का अंतर हो सकता है, जिससे कार्यबल उत्पादकता इस क्षेत्र में उपलब्ध सबसे महत्वपूर्ण अप्रयुक्त विकास अवसरों में से एक बन जाती है।
  • लगातार 30 प्रतिशत उत्पादकता वृद्धि भविष्य के विनिर्माण उत्पादन में लगभग 35 प्रतिशत का योगदान दे सकती है और प्रतिस्पर्धात्मकता, मार्जिन तथा विकास में दीर्घकालिक लाभ पैदा कर सकती है।
  • रिपोर्ट में विनिर्माण संगठनों में उत्पादकता के सामने आने वाली सात प्रमुख बाधाओं की पहचान की गई है। इनमें संगठनात्मक संरचना की अक्षमताएं, प्रक्रियाओं और प्रणालियों की कमजोरियां, क्षमता संबंधी कमियां, शिफ्ट उत्पादकता में अंतर और अप्रत्यक्ष कर्मचारियों की संख्या में अनावश्यक वृद्धि शामिल हैं।
  • ‘प्रोडक्टिविटी ट्रायड’ ढांचे के अनुसार, विनिर्माण संगठन काम करने के तरीकों में नए सिरे से बदलाव, संगठनात्मक संरचना के पुनर्गठन और कार्यबल के पुनर्संयोजन के जरिए 15-30 प्रतिशत तक उत्पादकता वृद्धि हासिल कर सकते हैं।
  • एआई विनिर्माण की पूरी वैल्यू चेन में उत्पादकता बढ़ाने वाले एक प्रमुख कारक के रूप में उभर रहा है। इसका प्रभाव उत्पादन, गुणवत्ता, वित्त, मानव संसाधन, खरीद, इंजीनियरिंग और ग्राहक सेवा सहित विभिन्न कार्यों में लगातार बढ़ रहा है।

कुल मिलाकर, ये निष्कर्ष इस बात को रेखांकित करते हैं कि विनिर्माण क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मकता के अगले दौर में केवल अधिक लोगों या परिसंपत्तियों को जोड़ने से सफलता नहीं मिलेगी, बल्कि काम करने के तरीके में बुनियादी बदलाव करना होगा। जो संगठन अभी कार्यबल उत्पादकता बढ़ाने, भविष्य की जरूरतों के अनुरूप क्षमताएं विकसित करने और एआई-सक्षम परिचालन मॉडल को अपनाने की दिशा में कदम उठाएंगे, वे विकास में तेजी ला सकते हैं, लाभप्रदता मजबूत कर सकते हैं और भारत की विनिर्माण यात्रा के अगले अध्याय को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

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