Editorial : क्रूरता-उत्पीडऩ और पीड़ा की अवधारणा
Editorial: The concept of cruelty, oppression and suffering

Editorial : मनोविज्ञानी के अनुसार वास्तविक परेशानी को पहचानने या उसका कोई व्यावहारिक समाधान ढूंढने के बजाय, पुरुष हिंसा का सहारा लेकर असहमति को जल्दी से समाप्त करना चाहते हैं। किसी पुरुष को लडऩा बेहद रोमांचक लगता है और उससे उसे नई स्फूर्ति मिलती है। वह इस रोमांच को बार-बार पाना चाहता है।
अगर कोई पुरुष हिंसा का प्रयोग करता है कि वह जीत गया है और अपनी बात मनवाने का प्रयत्न करता है, हिंसा की शिकार, चोट व अपमान से बचने के लिए, अगली स्थिति में, उसका विरोध करने से बचती है। क्रूरता, उत्पीडऩ, यातना और पीड़ा की अवधारणा हमारे समाज में लंबे समय से प्रचलित है।
मनोविज्ञान के अनुसार हालात इत्यादि के चलते कुछ महिलाओं की सोच में प्यार की जगह नफरत, भरोसे ही जगह धोखा और साथ निभाने के बजाय रिश्तों को खत्म कर देने की सोच ने जन्म ले लिया है। बल्कि पिछले कुछ समय में ऐसे कई केस सामने आए हैं, जहां महिलाएं रिश्तों से उबरने की बजाय उन्हें खत्म करने का रास्ता चुन रही हैं। हालिया घटनाओं में अधिकतर मध्यम वर्ग की ऐसी महिलाएं हैं, जो छोटे शहरों से हैं।
ये देखना इसलिए जरूरी है क्योंकि हमारे समाज के ढांचे में मध्यम वर्ग की महिलाओं पर ही सारे नियम लादे गए थे। वही सालों से दबी रही हैं। छोटे शहरों की ये महिलाएं सालों से बंधनों में बंधी रही हैं। अब सोशल मीडिया का एक्सेस हर किसी के पास है, इसमें सामाजिक स्तर का या छोटे शहरों का कोई कनेक्शन नहीं है। लेकिन इन महिलाओं ने अपनी माओं को, दादियों को मर्द प्रभावी समाज से शोषित होते हुए देखा है।
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आजकल न केवल कुछ पुरुष, बल्कि कुछ महिलाएं भी क्रूर व्यवहार का रास्ता अपनाती जा रही हैं। क्रूरता शारीरिक और मानसिक दोनों हो सकती है। जीवनसाथी को शारीरिक चोट पहुंचाना जैसे शरीर, अंग या स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाना या मृत्यु शारीरिक क्रूरता मानी जाएगी। अगर किसी व्यक्ति को एक या दो कामों से गंभीर चोट पहुंचती है तो उसे शारीरिक क्रूरता माना जाएगा।



