Editorial : जीवनदायी तत्वों का विनाश

Editorial : Destruction of life-giving elements

Editorial : Destruction of life-giving elements
Editorial : Destruction of life-giving elements

Editorial : जलवायु परिवर्तन के चलते धरती पर पानी के भंडार खतरे में पड़ गए हैं। हिमनदों के पिघलने की गति बढ़ती जा रही है जिसके चलते आने वाले 40-50 वर्षों में ग्लेशियर समाप्त होने के कगार पर होंगे।भारत में 45 फीसदी क्षेत्र भूजल के अधिक दोहन के कारण लाल सूची में आ गए हैं। हिमनदों के जल्दी पिघलने के कारण हिमालयी क्षेत्रों में हिमनद जनित झीलें बन रही हैं।

हवा प्रदूषण इस हद तक बढ़ गया है कि विश्व के अनेक क्षेत्र गैस चैंबर बनते जा रहे हैं। अत्यधिक ऊर्जा की मांग के कारण जीवाश्म ईंधनों के प्रयोग में वृद्धि हो रही है। निर्माण कार्यों के कारण ग्रीन हाउस गैसों को प्रचूषित करके नियंत्रण करने वाले वनों का भी बहुत कटान हो रहा है। भारतवर्ष चीन और अमरीका के बाद सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन करने वाला देश बन गया है।

गत वर्षों में भारत कोयले के खनन को लगभग 5 फीसदी बढ़ा चुका है। हिमनदों की बर्फ कच्चे मलबे के साथ टूट कर पर्वतीय संकरी घाटियों में गिर कर बर्फीले मलबे के बांध बना देती है, जिसमें हिमनदों का पानी जमा होता रहता है और जब पानी की मात्रा बांध की दीवार की झेलने की शक्ति से ज्यादा हो जाती है, तब ये हिमनद बांध टूट कर निचले क्षेत्रों में बाढ़ लाकर भारी तबाही का कारण बनते हैं।

हिमालय में इस समय 28000 के करीब हिमनद झीलें बन चुकी हैं जिनमें से बहुत सी खतरनाक साबित हो सकती हैं। उपजाऊ जमीनें अत्यधिक उपज लेने के चक्कर में रासायनिक खादों और कीटनाशक और खरपतवार नाशक दवाइयों के प्रयोग के कारण अपनी शक्ति खोती जा रही हैं। यानी जिंदा रहने के लिए सबसे जरूरी तीनों तत्व खतरे की चपेट में हैं। और जलवायु परिवर्तन के कारण प्राकृतिक आपदाओं का क्रम भी बढ़ता जा रहा है।

प्लास्टिक कचरे के जल में पहुंचने से माइक्रो प्लास्टिक और नैनो प्लास्टिक मछलियों के पेट में पहुंच रहा है और वहां से मनुष्य के भोजन के रास्ते मनुष्य शरीर में पहंच कर नई नई समस्याएं पैदा कर रहा है। ग्लेशियर पिघलने से लाखों सालों से दबे कई तरह के वायरस भी प्रकट हो रहे हैं जिनके बारे में कोई समझ अभी विकसित होना कठिन है।

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