भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था
भारतीय लोकतंत्र में मतदाता का स्थान सर्वोच्च है। क्योंकि वह मत देने वाला ‘दाताÓ है, जबकि नेता तो उसके वोट की उम्मीद कर जीतने की आशा रखता है। इसी चुनाव से लोकतन्त्र मजबूत होता है। यही संविधान अपने नागरिकों को अभिव्यक्ति की आजादी प्रदान करता है। जनता का प्रतिनिधित्व तथा देश को नेतृत्व प्रदान करने वाले नेताओं से आशा की जा सकती है कि उनका आचरण तथा व्यवहार अच्छा हो। राजनीति में साम, दाम, दण्ड, भेद सब कुछ चलता है, लेकिन नागरिकता तथा न्याय की परिधि में ही सब कुछ शोभित होता है। यदि किसी नागरिक के अधिकारों का हनन हो रहा हो तो उसे सीमाओं में रहते हुए मर्यादित भाषा, वाणी एवं आचरण से अपने विचार रखने की स्वतन्त्रता है। नेता को अनुकरणीय एवं उदाहरणीय होना चाहिए। जहां मतदाता अपने पसंदीदा उम्मीदवार से नम्र, विनम्र, सभ्य, सुशील, शिक्षित तथा व्यवहार कुशल होने की आशा रखता है, वहीं पर चुनावी मौसम में नेता कुछ भी बोलने तथा करने से परहेज नहीं करते।
चुनावों के दौरान नेता किसी भी कीमत पर चुनाव जीतने के लिए किसी भी घटिया तथा निम्न स्तर पर चले जाते हैं तथा भाषा, वाणी, मर्यादा, व्यवहार तथा आचरण सब कुछ भूल जाते हैं।
प्रतिष्ठित नेताओं के लिए अपनी सुविधानुसार पार्टी बदलना एक आम बात हो गई है। कोई भी पार्टी एक विचारधारा होती है, उसके कुछ सिद्धांत होते हैं। चुनाव एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें हम संवैधानिक मूल्यों, नियमों, सिद्धान्तों तथा प्रक्रियाओं में आस्था रखते हुए पांच वर्षों के उपरान्त चुनावी यज्ञ में प्राप्त अमृत से देश की सेवा करने के लिए राजा नहीं, बल्कि सेवक चुनते हैं। चुनावी मौसम में नेताओं की वाणी नफरत के बोलों से आग उगल रही है, व्यवहार ऐसा जैसे कि घमंड और अहंकार की पराकाष्ठा हो तथा आचरण निकृष्ट हो रहा है। चुनाव लडऩा तथा जीतना जीवन का अन्तिम उद्देश्य नहीं है। नेताओं तथा राजनीतिक दलों को भी चाहिए कि लोकतन्त्रात्मक व्यवहार एवं सिद्धान्तों के अनुरूप विनम्रतापूर्वक जनता के जनादेश को जीत या हार के रूप में स्वीकार करें। चुनावी मौसम में नेताओं की वाणी परस्पर आग के गोले बरसाती रहती है और जनता राजनीतिक आरोपों-प्रत्यारोपों का आनन्द लेती रहती है।



