Editorial : हिंदू-मुसलमान’ की बात कब तक?
Editorial: How long will we continue talking about Hindus and Muslims?

Editorial : आज जब भारत दुनिया में एक उभरती शक्ति के रूप में पहचाना जा रहा है, तब देश की सियासत एक बार फिर धर्म और जाति की दलदल में फँसती दिखाई दे रही है। देश के शीर्ष नेताओं से लेकर क्षेत्रीय राजनीति तक, हर मंच पर बहस का केंद्र हिंदू-मुसलमान, जाति-पांति और साम्प्रदायिक उन्माद बनता जा रहा है। सवाल उठता है — क्या इसी के लिए हमारे संविधान की शपथ ली गई थी?
हमारे संविधान में स्पष्ट कहा गया है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी और लोकतांत्रिक गणराज्य है। परंतु दुर्भाग्य की बात है कि सियासी गलियारों में यह संकल्प केवल भाषणों तक सीमित रह गया है। सभीसम्मानित नेता जिनसे देश के नागरिक विकास, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य की नीतियों की उम्मीद करते हैं — वे भी आज मंचों से बार-बार धर्म और जाति की बातों को हवा देते नजर आते हैं।
देश की एक बड़ी आबादी आज भी रोज़गार, महंगाई, स्वास्थ्य, शिक्षा और किसानों की बदहाली से जूझ रही है।छोटे व्यापारी आर्थिक दबाव में हैं, युवा बेरोज़गारी से परेशान हैं, महिलाएँ असुरक्षा के साये में जी रही हैं और सीमाओं पर हमारे जवान दिन-रात देश की रक्षा में लगे हैं।लेकिन राजनीति में इन मुद्दों पर बात करने के बजाय धर्म और जाति की आग भड़काई जा रही है, जिससे समाज में नफरत, तनाव और टकराव की स्थिति बन रही है।
राजनीति के इस जातिगत और साम्प्रदायिक माहौल का सबसे बड़ा खतरा है देश की अखंडता और सामाजिक समरसता।इतिहास गवाह है कि जब-जब धर्म और जाति के नाम पर राजनीति हावी हुई है, तब-तब देश ने दंगे, फसाद और सामाजिक विघटन देखा है।
जरूरत है कि सभी सम्मानित नेतागण अपने शब्दों से देश को जोड़ें, तोड़ें नहीं।उनकी राजनीति का आधार विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और सामाजिक न्याय होना चाहिए न कि धर्म और जाति।देश की जनता को भी अब यह समझने की आवश्यकता है कि धर्म और जाति के नाम पर लड़ाने वाली राजनीति सिर्फ सत्ता के लालच मंक की जाती है।
हमें नेताओं से सवाल करना होगा —रोजगार के कितने अवसर बने शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति कितनी सुधरी किसानों और मजदूरों की स्थिति क्या बदली?देश की आर्थिक प्रगति में आम जनता को कितना लाभ मिला?
Editorial : वक्फ संशोधन बिल एक क्रांतिकारी कदम
यदि हमारी राजनीति का केंद्रबिंदु धर्म और जाति बना रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब देश में फिर से सामाजिक विद्वेष की आग भड़क सकती है।आज जरूरत है एक ऐसी राजनीति की, जो भारत की एकता, अखंडता, प्रगति और सामाजिक सौहार्द को मजबूत करे।सिर्फ तभी हमारा लोकतंत्र और हमारा भारत सच में विश्वगुरु बन सकेगा।



