Editorial : गठबंधन का दौर

Editorial: The era of coalitions

Editorial: The era of coalitions
Editorial: The era of coalitions

Editorial : भारतीय लोकतंत्र में 1977 के बाद से पार्टी के प्रभुत्व और कई पार्टियो के महा गठजोड़ के बीच झूलता आ रहा है। पहले कांग्रेस का दबदबा हुआ करता था तो मई 2014 के बाद से भारतीय जनता पार्टी इस हैसियत में पहुंच गई। कांग्रेस धीरे धीरे राज्यो से कटती आ रही है। अचानक कांग्रेस का जनाधार खत्म नही हुआ है। जिस तरह से भ्रष्टाचार के दोषियों का नाम अखबार में उजागर होता था, उस दौर में मतदाता कांग्रेस से मुह मोड़ते गए।

1977 में इंदिरा गांधी की निरंकुश इमरजेंसी और जेपी आंदोलन की परिणीति जनता पार्टी के स्वरूप में एक महागठबंधन में हुई, जिसमे वैचारिक रूप से विपरीत ध्रुव की पार्टियां शामिल थी। क्योंकि ये गठबंधन मजबूरी में बनाये गए थे। चुनाव के बाद जीत की खुशी दोगुनी होती है, लेकिन बीच मे विवाद खड़ा होता है तो मायूस हो जाते है। जनसंघ से लेकर वाममोर्चे तक, जयप्रकाश नारायण कांग्रेस विरोधी विपक्ष के मसीहा बन गए।

कांग्रेस अब हर राज्य में गठबंधन के साथ चुनाव लड़ रही है। यूपी में समाजवादी के साथ गठबंधन में रही कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा था। बिहार में राजद के साथ गठबंधन में भी गीले शिकवे पैदा हो गए है। कांग्रेस की विचारधारा जनता के अनुरूप नही है। कांग्रेस अपने मन की करती है, उसी का नतीजा है कि कांग्रेस की कथनी करनी में समानता नजर नही आती है। नीतीश और भाजपा के सीट बंटवारे कर दिए गए है और शांति के साथ चुनाव के लिए कार्यकर्ताओ को जवाबदेही सौंप दी गई है।

उधर, कयास लगाया जा रहा है कि महागठबंधन खंड-खंड बंट चुका है। घटक दल अब एक दूसरे के खिलाफ हो चुके है। महागठबंधन नाम का कोई चीज अब शेष नही रहा है। एनडीए के गढ़ को रोकना अब आसान नही है। बिहार में लालू और नीतीश ने मिलकर महागठबंधन बनाया था और 2015 के बिहार विधानसभा चुनावों में भाजपा को कड़ी पटखनी दे दी।

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लेकिन उस महागठबंधन ने मात खा ली और नीतीश कुमार को फिर एनडीए की सच्चाई और कर्मनिष्ठा की याद आई। अभी नरेंद्र मोदी लोकप्रिय बने हुए है। राहुल की चुनौती कमजोर पड़ी है। राहुल के पास कोई ठोस मुद्दे नही है, जिससे मोदी और नीतीश की टक्कर ले सके। बेहतरीन कामकाज वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार है। इनके नेतृत्व में बिहार में भारी विकास हुआ है।

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