Editorial : वायु प्रदूषण गंभीर समस्या

Editorial : Air pollution is a serious problem

Editorial: Narendra Damodar Das Modi again echoed from Rashtrapati Bhavan...

राजधानी दिल्ली सहित उत्तर भारत के इलाकों में प्रदूषण का बेहद खतरनाक स्थिति में बना रहना चिन्ता में डालता है। हालत ये बनते हैं कि कभी-कभी सांस लेना मुश्किल हो जाता है और लोगों को घरों में ही रहने को मजबूर होना पड़ता है। आम आदमी को पता ही नहीं होता है कि किन प्रमुख कारणों से वह प्रदूषण फैला रहा है और किस तरह वे इस जानलेवा प्रदूषण को नियंत्रित करने में सहयोगी हो सकते हैं। यह कैसा समाज है जहां व्यक्ति के लिए पर्यावरण, अपना स्वास्थ्य या दूसरों की सुविधा-असुविधा का कोई अर्थ नहीं है। जीवन-शैली ऐसी बन गयी है कि आदमी जीने के लिये सब कुछ करने लगा पर खुद जीने का अर्थ ही भूल गया। प्रदूषण की अनेक बंदिशों एवं हिदायतों के बावजूद प्रदूषण नियंत्रण की बात खोखली साबित हो रही है। दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, फरीदाबाद, गुरुग्राम में प्रदूषण का बड़ा कारण पड़ोसी राज्यों से आने वाला पराली का धुआं होता है। पराली के बाद पटाखों का धुआं भी बड़ी समस्या है, इसके अलावा सड़कों पर लगातार बढ़ते निजी वाहन, गुणवत्ता के ईंधन का उपयोग न होना, निर्माण कार्य खुले में होना, उद्योगों की घातक गैसों व धुएं का नियमन न होने एवं बढ़ता धूम्रपान जैसे अनेक कारण वायु प्रदूषण बढ़ाने वाले हैं। जानलेवा प्रदूषण का प्रभाव गर्भवती महिलाओं पर होने से बच्चे समय से पहले जन्म ले लेते हैं, इनका समुचित शारीरिक विकास सही ढ़ंग से नहीं हो पाता। इससे बच्चों का कम वजन का पैदा होना, अस्थमा तथा फेफड़ों की बीमारियां से पीड़ित होना हैं। मुश्किल यह है कि वायुमंडल के घनीभूत होने की वजह से जमीन से उठने वाली धूल, पराली की धुंध और वाहनों से निकलने वाले धुएं के छंटने की गुंजाइश नहीं बन पाती है। नतीजन, वायु में सूक्ष्म जहरीले तत्व घुलने लगते हैं और प्रदूषण के गहराने की दृष्टि से इसे खतरनाक माना जाता है। चिंता की बात यह है कि भारत व चीन में वायु प्रदूषण से मरने वालों की कुल संख्या के मामले में यह आंकड़ा वैश्विक स्तर पर 54 फीसदी है। जो हमारे तंत्र की विफलता, गरीबी और प्रदूषण नियंत्रण में शासन-प्रशासन की कोताही एवं लापरवाही को ही दर्शाता है। इसमें आम आदमी की लापरवाही भी कम नहीं है।

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