Editorial: दायरे के बाहर की सोच
Thinking outside the box

Editorial: अंग्रेजी में एक कहावत है आवुट ऑफ बॉक्स थिंकिंग। इस का मतलब है किसी भी बारे में आम सोच से हट के सोचना। कुछ अलग, कुछ नया सोचना। विज्ञान में इसे आविष्कार करना कहते हैं। विश्व में हजारों, लाखों लोग हैं जो विज्ञान, बिज़नेस, इतिहास इत्यादि में कुछ नया करते रहते हैं। और एक अलिखित नियम है कि ऐसा करने वालों के काम या रास्ते आसान नहीं होते। कई मुसीबतों, मुश्केलिओं का सामना करना पड़ता है। जूझना पड़ता है।
यार, दोस्त, रिश्तेदार कुछ नया नहीं करने के लिए सदैव आप से कहते रहते हैं। बल्कि डराते रहते हैं कहना अधिक उचित होगा। अगर भूतकाल में सारे लोग दूसरों के बनाए रास्तों पर ही चलते तो हमें नया क्या मिलता? इस्तेमाल की नई वस्तुएं, बिमारियों के लिए नई दवाइयां कैसे और कहाँ से मिलती? और इसी लिए हट के सोचना बहुत जरूरी है। यह हट के सोचना आज के दौर में व्यापर और उद्योग में बहुत जरूरी है।
यदि बाज़ार में टिके रहना है तो हर समय कुछ नया देते रहना होगा। लोगों को कुछ नए की आशा रहती है और जब वह पूरी नहीं होती तो वह पुरानी बातों और वस्तुओं से ऊबने लगते हैं। जब ऐसा होता है तो व्यापर पर बुरी असर पड़ने लगती है। आपके उत्पाद जुने, पुराने हो जाते हैं। आउट ऑ$फ डेट। मार्किट में बने रहने के लिए कुछ नया देते रहना जरूरी है।
पश्चिम के देशों में हर छोटी बड़ी कंपनी के पास रिसर्च एन्ड डेवेलपमेंट विभाग होता है जिस का काम उत्पादों में कुछ नया करना या सुधार करना होता है। यह कंपनियां इस विभाग पर करोड़ों रुपये का खर्च करती हैं। यह नया उत्पादों तक ही सिमित नहीं होता। उत्पादों की पेकिंग तक में कुछ नया किया जाता है। यही हाल वस्त्र बनाने वाली कम्पनिओं का है। हर साल नई फैशन दिखाई देती है। साहित्य में भी आप को नई सोच नजर आएगी।
Editorial : एकता के प्रतीक सरदार वल्लभभाई पटेल
पश्चिमी देशों की इस सोच और कार्यों के मुकाबले भारत में बिलकुल उल्टा है। वहां एक कंपनी अपने उत्पादों में कई सालों तक कुछ बदलाव नहीं करती। ना तो उत्पादों में ना ही उन के पेकिंग में। अपनी बात समझाने के लिए केवल एक ही उदहारण दे रहा हु। भारत में बिस्किट बनाए वाली कई कम्पनियाँ हैं। पार्ले, ब्रिटानिया इत्यादि प्रमुख हैं। इन के द्वारा बनाए गए बिस्कुटों में कोई नयापन नहीं है। और न ही इन के पैकेजिंग में कुछ नयापन है।
आज से बीस, पच्चीस साल पूर्व जो उत्पाद और पेकिंग थे वही आज भी हैं! न तो स्वाद , न साइज़ और न तो पैकेजिंग में कुछ नयापन दिखाई देता है। ऐसा नहीं कि भारतीय उत्पादक और व्यापारियों के पास कुछ नया करने वालों की कोई कमी है। दर असल कुछ नयापन करने के लिए जो खर्च करना पड़ता है उस की इच्छा की कमी है। धनराशि की कमी जरा भी नहीं है।



