Editorial : रेड लाइट पर भीख मांगते मासूम
Editorial: Innocents begging at the red light

Editorial : जब हम दिल्ली की चमक-दमक, ऊंची इमारतों और मेट्रो की रफ्तार की बात करते हैं, तो हमें गर्व महसूस होता है। लेकिन उसी शहर की सड़कों पर, खासकर रेड लाइट्स पर, जब नन्हे हाथ कांच पर दस्तक देते हैं, या कोई बुज़ुर्ग थका-हारा भीख मांगता दिखता है, तो दिल एक पल को रुक जाता है। सवाल उठता है – क्या यह वही राजधानी है, जिसे हम ‘भारत का दिल’ कहते हैं?
भिखारियों की बढ़ती संख्या अब दिल्ली के ट्रैफिक का हिस्सा बन चुकी है। हर रेड लाइट पर कोई न कोई दिख ही जाता है – कोई बच्चा जिसे स्कूल में होना चाहिए, कोई मां जिसकी गोद में भूखा बच्चा है, या कोई अपाहिज जिसकी लाठी ही उसका सहारा है। यह सिर्फ गरीबी की तस्वीर नहीं है, यह उस तंत्र की विफलता भी है जो हर नागरिक को सम्मानजनक जीवन देने का दावा करता है।
चौंकाने वाली बात यह है कि इस समस्या के पीछे एक संगठित गिरोह भी काम कर रहा है। कई बार देखा गया है कि भिखारियों को अलग-अलग इलाकों में “तैनात” किया जाता है, और जो पैसा वे इकट्ठा करते हैं, उसका बड़ा हिस्सा किसी और की जेब में जाता है। इसका सबसे बड़ा शिकार होते हैं मासूम बच्चे – जिन्हें पढ़ाई-लिखाई से दूर करके इस दलदल में धकेल दिया जाता है।
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रेड लाइट पर भिखारी न सिर्फ एक सामाजिक समस्या हैं, बल्कि ट्रैफिक और सुरक्षा के लिहाज़ से भी एक बड़ा खतरा हैं। अचानक किसी का गाड़ी के सामने आ जाना किसी बड़े हादसे को न्योता दे सकता है। सरकार और प्रशासन ने कई योजनाएं बनाई हैं, लेकिन उनके असर ज़मीन पर दिखाई नहीं देते। जब तक पुनर्वास, शिक्षा, और कौशल विकास जैसे ठोस उपाय नहीं होंगे, तब तक यह समस्या ऐसे ही बनी रहेगी।
पर सिर्फ सरकार को दोष देना भी आसान रास्ता है। हम, आम लोग, जो हर रेड लाइट पर कुछ सिक्के देकर आगे बढ़ जाते हैं, क्या कभी सोचते हैं कि हम समस्या को हल कर रहे हैं या बढ़ावा दे रहे हैं?
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अब समय आ गया है कि हम इस “आदत” को बदलें। जरूरतमंदों की मदद जरूर करें, लेकिन सही तरीके से जैसे किसी एनजीओ के माध्यम से, या सरकारी पुनर्वास कार्यक्रमों को समर्थन देकर। दिल्ली को अगर सचमुच एक “स्मार्ट सिटी” बनाना है, तो सबसे पहले हमें इसकी सड़कों पर खड़ी इन कड़वी सच्चाइयों से नज़रें मिलानी होंगी। वरना जितनी भी ऊंची इमारतें बना लें, ज़मीर का यह दीया हमेशा बुझा ही रहेगा।



