Editorial : आर्थिक गतिविधियों का समागम

Editorial: Confluence of economic activities

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Editorial: दुनिया का सबसे बड़ा समागम है, जिसमें लगभग 40 करोड़ लोग हिस्सा लेने वाले हैं। महाकुंभ के पहले ही दिन 13 जनवरी 2025 को पौष पूर्णिमा स्नान के अवसर पर 1.5 करोड़ लोगों ने संगम में डुबकी लगाई तो 14 जनवरी 2025 को मकर संक्रांति के अवसर पर 3.5 करोड़ लोगों ने संगम में डुबकी लगाई। 46 दिन चलने वाले महाकुंभ मेला देश की जीडीपी में एक प्रतिशत तक की वृद्धि कर सकता है। प्रदेश की जीडीपी में तो उससे कहीं ज्यादा वृद्धि हो सकती है।

हालांकि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की गणना के अनुसार, महाकुंभ में अपेक्षित 40 करोड़ लोग 5 हजार रुपए प्रति व्यक्ति के हिसाब से खर्च करे तो इससे 2 लाख करोड़ रुपए का आर्थिक प्रभाव होगा। दुनिया के लिए यह एक अचंभे से कम नहीं है कि एक ही स्थान पर 40 करोड़ श्रद्धालु आएंगे, जिसके लिए प्रशासन ने प्रयागराज में मेला स्थान को 3200 हेक्टेयर से बढ़ा कर 4000 हेक्टेयर कर दिया है। घाटों की लंबाई अब 12 किलोमीटर है जो 2009 में मात्र 8 किलोमीटर ही थी।

कुंभ मेला एक स्थान पर नहीं, बल्कि ज्योतिषीय गणना के आधार पर चार अलग-अलग स्थानों पर लगता है। कुंभ मेला, एक विशाल हिंदू तीर्थयात्रा और त्यौहार है, जिसे 2017 में यूनेस्को द्वारा मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में अंकित किया गया था। यह मान्यता एक अद्वितीय और अमूल्य सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के रूप में त्यौहार के महत्व को उजागर करती है, जो भारत की समृद्ध आध्यात्मिक परंपराओं को प्रदर्शित करती है और विविध समुदायों के बीच एकता को बढ़ावा देती है।

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कुंभ मेले में 12 साल के अंतराल का कारण यह है कि वृहस्पति को सूर्य के चारों ओर एक चक्कर पूरा करने में 12 साल लगते हैं। कुंभ मेला वेबसाईट के अनुसार, जब बृहस्पति कुंभ राशि में होता है और सूर्य और चंद्रमा क्रमश: मेष और धनु राशि में होते हैं तो हरिद्वार में कुंभ आयोजित किया जाता है।

जब बृहस्पति वृषभ राशि में होता है और सूर्य और चंद्रमा मकर राशि में होते हैं तो कुंभ प्रयागराज में आयोजित किया जाता है। जब बृहस्पति सिंह राशि में होता है, सूर्य और चंद्रमा कर्क राशि में होते हैं तो कुंभ नासिक और त्रयंबकेश्वर में आयोजित किया जाता है, यही कारण है कि इन्हें सिंहस्थ कुंभ भी कहा जाता है।

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