Editorial : मतदान का प्रतिशत घटना चिंताजनक

Editorial: The decrease in voting percentage is worrying

Editorial: The decrease in voting percentage is worrying

Editorial : लोकसभा चुनाव के तीन चरणों का मतदान होने के उपरांत यह और स्पष्ट है कि भाजपा के तमाम प्रत्याशी अपनी जीत के लिए प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता और छवि पर आश्रित हैं। पहले-दूसरे तथा तीसरे चरण के मतदान का प्रतिशत कम रहा। तमाम पार्टियां अपने-अपने दावे कर रही हैं। हम जिस चिंताजनक की बात कर रहे हैं, पार्टियों ने शायद ऐसे उम्मीदवार नहीं दिए, जिससे मतदाता बाहर आएं। जहां तक भाजपा की बात है तो वहां चेहरा प्रधानमंत्री मोदी हैं। उनके सामने बाकी उम्मीदवार गौण हो जाते हैं।

डाटा के अनुसार पहली बार के मतदाताओं में से 62 फीसदी ने अपना पंजीकरण तक नहीं कराया है। यह राजनीतिक दलों के लिए सोचने का विषय है। यह पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए चिंता का विषय है। 2019 और 2024 में फर्क यह भी है कि 2024 में राहुल गांधी वैसे मुद्दा नहीं हैं, जैसे 2019 में थे। अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग चेहरे पर विपक्ष लड़ रहा है। वोटिंग कम होने का एक बड़ा कारण यह है कि मतदाताओं में न तो पक्ष के प्रति, न ही विपक्ष के प्रति कोई उत्साह है।

चुनाव आयोग ने बहुत से कदम उठाए। इन सबके बीच कुछ नई चीजें हुई हैं। कुछ लोग विदेश से भी वोट डालने के लिए आए। फर्स्ट टाइम वोटर्स भी दिखाई दिए। महिलाएं भी कतारों में नजर आईं। इन सबके बाद भी मतदान प्रतिशत क्यों गिर रहा है।

Editorial : कांग्रेस की शाख दांव पर

देश के सभी राज्यों में 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में मतदाताओं को मतदान केंद्र तक पहुंचाने में सबसे बड़ी भूमिका भाजपा संगठन की रही है। मतदान कम होने से सबसे ज्यादा नुकसान भाजपा को ही होता हुआ दिख रहा है। पिछले 10 वर्षों में भाजपा संगठन को पूरी तरह से प्रोफेशनल कंपनी की तरह संचालित किया जा रहा है। जो भाजपा के नेता सत्ता की कुर्सी पर विराजमान हैं। उनका भाजपा संगठन के साथ कोई लगाव नहीं रहा है। जब चुनाव आते हैं, तब पार्टी के पदाधिकारी और कार्यकर्ताओं को एकत्रित कर रैली, जनसभाओं में भीड़ लाने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है।

Editorial : रेडक्रॉस की भूमिका

आसपास के जो वोट निकालकर मतदान केद्रो तक ले जाते थे, निराशा में होने के लिए वह खुद तो वोट डाल रहे हैं। मतदाता को मतदान केंद्र तक ले जाने की जहमत नहीं उठा रहे हैं। गर्मी और खेती किसानी के कारण मतदाता अपने घरों से नहीं निकल रहा है। भाजपा के कार्यकर्ता भी चुप्पी साधकर बैठ गए हैं। भाजपा संगठन में जिस तरह से कांग्रेस के लोगों को लाया जा रहा है। इसका विरोध करने के लिए नोटा के अलावा और किसी को वोट तो दे नहीं सकते हैं। भाजपा संगठन को ताई की बात को समझना होगा।

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