Editorial : कांग्रेस की शाख दांव पर
Editorial: Congress branch at stake

Editorial: 18वीं लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस नेता राहुल आखिर रायबरेली से नामांकन दाखित कर दिया और अपनी विरासत को बचाने के लिए मैदान में आ गए हैं। कहा जाता है कि दुनिया का कोई भी व्यक्ति अगर अपनी विरासत को विस्मृत कर देता है, तो उसे नए सिरे से अपनी ज़मीन तैयार करनी पड़ती है। और अगर विरासत के आधार पर अपने कदम बढ़ाता है तो उसकी आधी राह आसान हो जाती है। राहुल गांधी के सामने तमाम सवाल होने के बाद भी ऐसा लगता है कि उन्होंने अपनी आधी बाधा को पार कर लिया है।
यहाँ सवाल यह नहीं हैं कि राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस ने रायबरेली को क्यों चुना, बल्कि सवाल यह है कि राहुल गांधी ने अमेठी को क्यों छोड़ा। क्या वास्तव में राहुल गांधी को फिर से अपनी पराजय का डर लगने लगा था? अगर यह सही है तो फिर ऐसा क्यों है कि राहुल गांधी हर बार अपने लिए सुरक्षित स्थान की तलाश क्यों करते हैं। राहुल गांधी को रायबरेली से उम्मीदवार बनाकर यह तो सन्देश दिया ही है कि भारत में रायबरेली ही राहुल गांधी के लिए सबसे सुरक्षित लोकसभा सीट है। यहाँ कांग्रेस का परम्परागत मतदाता है, वहीं यह क्षेत्र नेहरू गांधी परिवार की विरासत भी है।
रायबरेली को कांग्रेस का गढ़ इसलिए भी माना जाता है कि क्योंकि यहाँ से इंदिरा गांधी के पति फिरोज खान दो बार सांसद रहे, उसके बाद इंदिरा गांधी भी सांसद रहीं। अब पिछले पांच बार से सोनिया गांधी लोकसभा का चुनाव जीती हैं। वर्ष 1977 के आम चुनाव में जनता लहर में इंदिरा गांधी को भी पराजय का दंश भोगना पड़ा। उसके बाद एक बार भाजपा ने भी परचम लहराया है। इसलिए यह कहा जाना कि रायबरेली में कांग्रेस आसानी से विजय प्राप्त करेंगी। सवाल यह भी था कि कांग्रेस की ओर से अमेठी और रायबरेली से किसको प्रत्याशी घोषित किया जाए, क्योंकि इन दोनों सीटों पर प्रथम तो गांधी परिवार का पुख्ता दावा बनता था।
लेकिन सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या राहुल गांधी के रायबरेली से उम्मीदवार बनाए जाने के बाद कांग्रेस अमेठी के चुनाव को गंभीरता से लेगी, क्योंकि अब कांग्रेस का पूरा जोर राहुल गांधी को जिताने में लगेगा। अब वायनाड से उम्मीदवारी के बाद रायबरेली की रुख करके फिर से संदेह को जन्म दिया है। ऐसा लग रहा है कि इस बार वायनाड का चुनाव बहुत ही टक्कर का माना जा रहा है।



