…..और बाबा जब भक्तों को बुलाते हैं तो रास्ते में कोई व्यवधान उसे रोक नहीं सकता!

@ यात्रा संस्मरण: गौरव पांडेय, गाजियाबाद । सच ही कहा जाता है कि जब तक बाबा किसी को बुलाते नहीं, तब तक वह बाबा के द्वार तक पहुंच सकता नहीं।
विगत कुछ दिनों पहले उत्तराखंड के चार धामों में एक श्री केदारनाथ धाम में भारी वर्षा एवं श्री बद्रीनाथ धाम के रास्ते में लैंडस्लाइड होने की वजह से रास्ता बंद होने की खबरें सबने पढ़ी व सुनी होगी। जिसके चलते बहुत से लोग तीर्थ यात्रा से वापस कर दिए गए और वो बाबा के दर्शन नहीं कर सके। दैव योग वश हमारी यात्रा का कार्यक्रम भी उसी अंतराल में था, और हमने भी समाचार सुनकर जाने का कार्यक्रम लगभग स्थगित कर दिया था।
# ऐसे बना यात्रा संयोग और बाबा श्री केदारनाथ के दर्शन पूजन से खिल गया मन कमल
लेकिन बाबा के आशीर्वाद से वर्षा रुक गई और जिस दिन हमें जाना था ठीक उसके एक दिन पहले दोपहर 2:00 बजे तक श्री बद्रीनाथ धाम के रास्ते भी साफ हो गए। इसलिए हमने भी अपने कार्यक्रम को पुनः व्यवस्थित करते हुए 22 अक्टूबर 2021 को अपनी यात्रा इंदिरापुरम, गाजियाबाद से प्रारंभ की और रात्रि में हम हरिद्वार, ऋषिकेश, देवप्रयाग होते हुए गुप्तकाशी पहुंचे। गुप्तकाशी में ही रात्रि विश्राम करने के पश्चात प्रातः हेलीकॉप्टर के माध्यम से बाबा केदारनाथ के दर्शन के लिए चले गए। इसे संयोग ही कहिए कि भारी वर्षा एवं रास्तों के बंद होने की सूचना फैलने की वजह से ज्यादा भीड़ नहीं थी। अतः हम आसानी से हेलीकॉप्टर ले सके, और मौसम भी खुला हुआ था; जिस वजह से हम प्रातः ही श्री केदारनाथ मंदिर के प्रांगण में पहुंच कर बाबा श्री केदारनाथ के परम पावन दर्शन पूजन कर सके। इससे मन कमल खिल गया।
# बाबा भैरव नाथ के दर्शन से बढ़ गई जीवन शक्ति, झेल पाए ठंड
बाबा श्री केदारनाथ के दर्शन के बाद हम बाबा भैरव नाथ के दर्शन करने गए, जहां काफी हिमपात हुआ, जिससे ठंड बहुत बढ़ गई। किंतु बाबा द्वारा दी गई शक्ति की वजह से हम वहां रह पाए और सांध्य कालीन आरती का भरपूर सत चित्त आनंद ले पाए। हमने वहां बाबा के दरबार में जी भर कर पूजा अर्चना की और अपने पूरे परिवार, मित्र जनों एवं संपूर्ण विश्व की सुख-शांति के लिए बाबा से आशीर्वाद मांगा। चूंकि अगले दिन सुबह बारिश की संभावना थी, इसलिए हम सुबह ही हेलीकॉप्टर के माध्यम से वापस गुप्तकाशी आ गए और वहां से हमारी श्री बद्रीनाथ यात्रा की शुरुआत हुई।
# मां काली मठ के मंदिर में तवे की रोटी और पहाड़ी साग का स्वाद निराला
श्री बद्रीनाथ धाम की ओर कुछ दूर चलने के बाद हम काली मठ जो कि एक शक्तिपीठ है, वहां पहुंचकर हमने मां दुर्गा देवी की उपासना की और मंदिर प्रांगण में सविधि पूजन किया। पूजन के पश्चात हमने मंदिर प्रांगण में ही तवे की रोटी और पहाड़ी साग का आनंद लिया। कालीमठ में मां का आशीर्वाद लेने के बाद हमने उखीमठ की ओर रुख किया। उखीमठ वही स्थान है जहां शीतकाल में बाबा श्री केदारनाथ डोली से आते हैं और यहीं विराजते हैं।
# उखीमठ की पौराणिकता से हुए अवगत, भगवान ओंकारेश्वर की पूजा-अर्चना की
परम्परा के मुताबिक जब श्री केदारनाथ में बर्फबारी प्रारंभ हो जाती है तो शीतकाल में भगवान जी को उखीमठ में ही लाया जाता है, जहां छह महीने उनकी पूजा-अर्चना होती है। इसलिए उखीमठ में भी हमने विधिवत पूजा अर्चना की और पंच केदारेश्वर के दर्शन किए। उखीमठ के पुजारी जी ने ही हमें बताया कि जो लोग पंच केदारेश्वर के दर्शन नहीं कर पाते और उखीमठ में दर्शन के लिए आते हैं, उनको पांच केदारेश्वर के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हो जाता है। बता दें कि उषा (बाणासुर की बेटी) और अनिरुद्ध (भगवान कृष्ण के पौत्र) की शादी यहीं सम्पन्न हुई थी। उषा के नाम से ही इस जगह का नाम उखीमठ पड़ा। उखीमठ में दक्षिण भारत के कर्नाटक प्रदेश के लिंगायत संतों रावल के प्रमुख गुरु का केंद्र गद्दी भी है। सर्दियों के दौरान भगवान केदारनाथ की उत्सव डोली को इस जगह के लिए केदारनाथ से लाया जाता है। भगवान श्री केदारनाथ की शीतकालीन पूजा और पूरे साल भगवान ओंकारेश्वर की पूजा यहीं की जाती है।

# काफी चौड़ी और सुगम्य है बाबा बद्रीनाथ सड़क
उखीमठ से हम प्रस्थान कर बद्रीनाथ की ओर बढ़े और रास्ते में कई जगह हमें लैंडस्लाइड के स्थान दिखाई पड़े। किंतु उन्हें प्रशासन द्वारा पूरी तरह से साफ कर दिया गया था और यातायात सुचारू रूप से चल रहा था। सड़कें सामान्यतः हमें बहुत ही अच्छी हालत में मिलीं और ज्यादातर सड़क पर दोनों तरफ से वाहन आ जा रहे थे।वाहनों के लिए सड़क काफी चौड़ी और सुगम्य प्रतीत हो रही थी जिससे हमें ज्यादा परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा। रात्रि में हम जब बद्रीनाथ पहुंचे तो, वहां पहुंचते ही बाबा बद्रीनाथ के मंदिर की तरफ रुख किया और दर्शन प्रक्रिया के बारे में जानकारी प्राप्त कर प्रातः कालीन दर्शन के लिए अपना कार्यक्रम सुनिश्चित किया।
# तप्त कुंड में पुण्य स्नान के पश्चात हुआ अलौकिक अनुभव
बाबा बद्रीनाथ धाम में प्रातः सबसे पहले प्राकृतिक रूप से गंधक से बने तप्त कुंड, जिसे गर्म पानी का स्रोत भी कहते हैं, वहां पर स्नान किया। जिसमें मुख्य रुप से यह ध्यान रखा कि सीधे गर्म पानी में प्रवेश नहीं किया जाए, क्योंकि वहां का तापमान बहुत ही कम था। ऐसे में सीधे गर्म पानी में प्रवेश कर जाना खतरनाक हो सकता है। इसलिए सबसे पहले अपने पांव को उस गर्म पानी में डाला। ततपश्चात धीरे-धीरे घुटनों तक और फिर कमर तक प्रवेश किये। पुनः धीरे-धीरे समय देकर पूर्ण रूप से अपने को उस तप्त कुंड में पुण्य स्नान के लिए उतारा। इस तप्त कुंड में स्नान के बाद बहुत ही अलौकिक अनुभव हुआ। ऐसा लगा कि मानो ठंड भाग गई हो शरीर से।
# अद्भुत है बाबा बद्री विशाल भगवान का श्रृंगार पूजन और महाआरती
उसके बाद पूरी उर्जा से सुबह 6:15 बजे भगवान बद्री विशाल के दर्शन पूजन के लिए हम मंदिर में गए और भगवान का श्रृंगार पूजन और आरती देखी, जो अनुपम और अलौकिक था। ऐसा माना जाता है कि बद्रीनाथ से ही स्वर्ग का रास्ता प्रारंभ हो जाता है, और यह ऐसा धाम है जहां दर्शन के बाद मोक्ष और सद्गति की प्राप्ति होती है। पुराणों के अनुसार, बद्रीनाथ में 3 किलोमीटर के क्षेत्र में ब्रह्म कपाल, जिसे ब्रह्मा जी का पांचवा सर माना गया है, वह गिरा था और वहां पितृ तर्पण और पिंड दान के बाद पितरों को मोक्ष प्राप्त होता है। यहां सर्वश्रेष्ठ और उच्चतम पितृ तर्पण और पिंडदान होता है।
# हिमालय की श्रेणियों से घिरा हुआ है कार्तिक स्वामी मंदिर
श्री बद्रीनाथ जी के दर्शन करने के बाद हम जोशीमठ होते हुए पोखरी से 15 किलोमीटर दूर स्थित कार्तिक स्वामी के दर्शन करने गए। इसमें 3 किलोमीटर की चढ़ाई है और यह बहुत ही उचित चोटी पर स्थित है। वहां लगे शिलापट के अनुसार, कार्तिक स्वामी, रुद्रप्रयाग जिले के पवित्र पर्यटक स्थलों में से एक है। रुद्रप्रयाग शहर से 38 किमी की दूरी पर स्थित इस जगह पर भगवान शिव के पुत्र, भगवान कार्तिकेय को समर्पित एक मंदिर है, जो समुद्र की सतह से 3048 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। यह स्थान शक्तिशाली हिमालय की श्रेणियों से घिरा हुआ है। पुराण कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव ने अपने दोनों पुत्रों से कहा कि वे पूरे ब्रह्माण्ड का चक्कर लगा कर आएं और घोषित किया कि जो भी पहले चक्कर लगा कर यहाँ आएगा, वह माता-पिता की पूजा करने का प्रथम अवसर प्राप्त करेगा।
इस पर भगवान श्री गणेश, जो कि शिव जी के दूसरे पुत्र थे, ने अपने माता-पिता के चक्कर लगाकर (श्री गणेश के लिए उनके माता-पिता ही ब्रह्माण्ड थे) यह प्रतियोगिता जीत ली, जिससे भगवान कार्तिकेय क्रोधित हो गए। तब उन्होंने अपने शरीर की हड्डियाँ अपने पिता को और मांस अपनी माता को दे दिया। ये हड्डियाँ अभी भी मंदिर में मौजूद हैं जिन्हें हज़ारों भक्त पूजते हैं। रुद्रप्रयाग-पोखरी मार्ग पर स्थित इस मंदिर तक कनक चौरी गांव से 3 किमी की ट्रेकिंग के द्वारा पहुंचा जा सकता है।
# अलकनंदा तथा मंदाकिनी नदियों का संगम स्थल है रुद्रप्रयाग
कार्तिक स्वामी के दर्शन के पश्चात हमने रुद्रप्रयाग में ही रात्रि विश्राम किया, जहां अलकनंदा तथा मंदाकिनी नदियों का संगम स्थल है। यहाँ से अलकनंदा देवप्रयाग में जाकर भागीरथी से मिलती है तथा गंगा नदी का निर्माण करती है। प्रसिद्ध धर्मस्थल श्री केदारनाथ धाम, रुद्रप्रयाग से 86 किलोमीटर दूर है। भगवान शिव के नाम पर रूद्रप्रयाग का नाम रखा गया है। रूद्रप्रयाग अलकनंदा और मंदाकिनी नदी पर स्थित है। रूद्रप्रयाग श्रीनगर (गढ़वाल) से 34 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। मंदाकिनी और अलखनंदा नदियों का संगम अपने आप में एक अनोखी खूबसूरती धारण किये हुए है। इन्हें देखकर ऐसा लगता है कि मानो दो बहनें आपस में एक दूसरे को गले लगा रही हों। ऐसा माना जाता है कि यहां संगीत के उस्ताद नारद मुनि ने भगवान शिव की उपासना की थी और नारद जी को आर्शीवाद देने के लिए ही भगवान शिव ने रौद्र रूप में अवतार लिया था।
# हरिद्वार हर की पैड़ी में किया गंगा स्नान और जल भरकर दिल्ली रवाना
रुद्रप्रयाग से हमने प्रातः ऋषिकेश होते हुए हरिद्वार की ओर प्रस्थान किया और वहां पहुंच कर हर की पैड़ी पर गंगा स्नान कर प्रसिद्ध मोहनपुरी वाले पर पूरी छोले हलवा और लस्सी का स्वाद लिया और गंगाजल लेकर दिल्ली की ओर प्रस्थान कर गए। इतने अच्छे दर्शन और इतनी सफल यात्रा को लेकर मन में बार-बार हर्ष उल्लास हो रहा था और एक नई ऊर्जा का संचार हो रहा था। सभी बाधाओं को दूर करते हुए जिस तरह से हमने यात्रा सफलतापूर्वक पूरी की, उसमें यह बात दोबारा से सच हो गई कि बाबा जब भक्तों को बुलाते हैं तो रास्ते में कोई व्यवधान उसे रोक नहीं सकता।



