Editorial : युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ कब तक ?

Editorial: How long will the future of the youth be toyed with?

Editorial: How long will the future of the youth be toyed with?
Editorial: How long will the future of the youth be toyed with?

Editorial :  झारखंड में सरकारी भर्ती परीक्षाओं को लेकर चल रहा छात्र और अभ्यर्थी आंदोलन अब केवल एक परीक्षा या कुछ पदों की भर्ती का मामला नहीं रह गया है। यह युवाओं के भविष्य, परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता और शासन-प्रशासन की जवाबदेही से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन चुका है। JPSC और JSSC की परीक्षाओं में कथित पेपर लीक तथा अन्य अनियमितताओं के आरोपों को लेकर बड़ी संख्या में अभ्यर्थी आंदोलन कर रहे हैं और स्वतंत्र जांच की मांग उठा रहे हैं।

सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाले युवाओं के लिए एक परीक्षा केवल प्रश्नपत्र और परिणाम का विषय नहीं होती। इसके पीछे वर्षों की मेहनत, आर्थिक संसाधन, पारिवारिक उम्मीदें और भविष्य के सपने जुड़े होते हैं। ऐसे में यदि परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं या प्रश्नपत्र लीक होने के आरोप सामने आते हैं, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान उन अभ्यर्थियों को होता है जिन्होंने ईमानदारी से तैयारी की है। हालिया विवाद ने इसी भरोसे को गहरी चोट पहुंचाई है।

स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरे युवाओं को बल प्रयोग का सामना करना पड़े। 10 अगस्त को रांची में विधानसभा की ओर मार्च कर रहे प्रदर्शनकारियों पर पानी की बौछार और आंसू गैस के इस्तेमाल की खबर सामने आई। लोकतंत्र में विरोध और असहमति के लिए स्थान होना चाहिए। यदि छात्रों की शिकायतें वास्तविक हैं, तो उनका समाधान संवाद और पारदर्शी जांच के माध्यम से होना चाहिए, न कि टकराव के जरिए।

सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती भरोसा बहाल करने की है। केवल जांच का आश्वासन पर्याप्त नहीं होगा। जांच समयबद्ध, निष्पक्ष और सार्वजनिक रूप से विश्वसनीय होनी चाहिए। दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई हो तथा भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने के लिए परीक्षा प्रणाली में तकनीकी और प्रशासनिक सुधार किए जाएं।

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झारखंड के युवाओं का आक्रोश केवल रोजगार की कमी का प्रतिबिंब नहीं है, बल्कि व्यवस्था से निष्पक्ष अवसर की मांग भी है। सरकार और आंदोलनरत अभ्यर्थियों दोनों को संवाद का रास्ता अपनाना चाहिए। परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और विश्वसनीयता कायम करना ही इस संकट का स्थायी समाधान है।

युवाओं के हाथ में किताब और मेहनत होनी चाहिए, आंदोलन की मजबूरी नहीं। उनकी उम्मीदों की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है। किसी भी राज्य की सबसे बड़ी पूंजी उसके युवा होते हैं; उनके भविष्य के साथ समझौता पूरे समाज के भविष्य के साथ समझौता है।

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