Editorial : वैश्विक रणनीति

Editorial: Global Strategy

Editorial : अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने इसे केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरे के रूप में देखा है। इसी पृष्ठभूमि में भारत जैसे लोकतांत्रिक, स्थिर और तेजी से उभरते बाजार वाले देश की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। सेमीकंडक्टर निर्माण के लिए जिन तत्वों की आवश्यकता होती है, उनमें से कई का वैश्विक नियंत्रण चीन के पास है। यह स्थिति रणनीतिक जोखिम पैदा करती है।

भारत-अमेरिका सहयोग इस निर्भरता को कम करने और वैकल्पिक स्रोत विकसित करने की दिशा में अहम कदम है। भारत के पास खनिज संसाधनों की संभावनाएं हैं, जिन्हें तकनीक और निवेश के माध्यम से वैश्विक आपूर्ति शृंखला से जोड़ा जा सकता है। इक्कीसवीं सदी में जिस तरह तेल को बीसवीं सदी की सबसे रणनीतिक वस्तु माना गया था, उसी तरह आज सेमीकंडक्टर को आधुनिक दुनिया की रीढ़ कहा जा सकता है।

मोबाइल फोन से लेकर मिसाइल प्रणाली, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लेकर ऑटोमोबाइल उद्योग तक-हर क्षेत्र में चिप्स की अनिवार्यता ने इसे भू-राजनीति का केंद्र बना दिया है। भारत लंबे समय तक सेमीकंडक्टर वैल्यू चेन में एक सीमित भूमिका निभाता रहा है, जहां उसका योगदान मुख्यत: चिप डिजाइन और आईटी सेवाओं तक सीमित था। हालांकि निर्माण, कच्चे माल की शुद्धता, और अत्याधुनिक फैब्रिकेशन जैसी क्षमताओं में देश पीछे रहा। रणनीतिक स्तर पर यह साझेदारी भारत की विदेश नीति में भी एक नया आयाम जोड़ती है।

Editorial : आर्थिक मजबूती का आधार

भारत लंबे समय से ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की नीति का पालन करता आया है, जहां वह किसी एक शक्ति गुट पर निर्भर न रहते हुए अपने हितों के अनुसार सहयोग करता है। यदि भारत केवल विदेशी कंपनियों के लिए एक उत्पादन स्थल बनकर रह जाता है, तो दीर्घकालिक लाभ सीमित होंगे। आवश्यकता इस बात की है कि देश में अनुसंधान और विकास को समानांतर रूप से बढ़ावा दिया जाए, विश्वविद्यालयों और उद्योग के बीच गहरा तालमेल बने, और घरेलू स्टार्टअप्स को इस पारिस्थितिकी तंत्र में स्थान मिले।

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