Editorial : स्वास्थ्य का मुद्दा
Editorial: Health Issues

ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी की रिपोर्ट के अनुसार देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है, लेकिन डॉक्टरों का बड़ा हिस्सा शहरों तक ही केंद्रित होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की भारी कमी है। मैदानी क्षेत्रों की अपेक्षा पहाड़ी राज्यों के दूर दराज गांवों की स्थिति इससे भी अधिक कठिन है, क्योंकि यहाँ अस्पताल तक पहुँचना ही अपने-आप में एक चुनौती है।
उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकांश गांवों से नजदीकी बड़े अस्पताल की दूरी कम से कम 20 से 50 किमी तक होना आम बात है। 2026-27 के केंद्रीय बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए लगभग 95 हजार करोड़ रुपये से अधिक का प्रावधान किया गया, जिसमें आयुष्मान भारत, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएँ और अस्पताल ढांचे को मजबूत करने की बात कही गई।
राज्य स्तर पर भी स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार की घोषणाएँ होती रहती हैं, पर पहाड़ के छोटे गांवों तक इनका असर बहुत धीमी गति से पहुंचता है। स्वास्थ्य सेवा का एक पहलू ऐसा भी है जिसके बारे में अक्सर कोई नहीं बोलता है। सैलानी की 20 वर्षीय प्रीति बताती है, “माहवारी के दौरान पेट दर्द जैसी समस्या होने पर अस्पताल में खुलकर बात नहीं कर पाती, क्योंकि डॉक्टर पुरुष हैं।
अगर महिला डॉक्टर होती तो हम खुलकर अपनी बात कह पाते। ” स्थानीय पोस्ट ऑफिस कर्मचारी उम्मेद सिंह कहते हैं, “यहाँ की जनसंख्या के हिसाब से अस्पताल तो है, लेकिन सुविधाएँ नहीं हैं। स्वास्थ्य सुविधा केवल एक सेवा नहीं, बल्कि लोगों की ज़िंदगी से जुड़ा विषय है।
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जब कोई गर्भवती महिला रात में दर्द सहते हुए वाहन का इंतजार करती है, जब कोई युवती अपनी तकलीफ बताने में संकोच करती है, या जब बुजुर्ग को दवा के बजाय रेफर-स्लिप मिलती है, तब समस्या सिर्फ अस्पताल की नहीं रहती बल्कि हाशिये पर रहने वाले लोगों तक सुविधा नहीं पहुंचाने की कमी को दर्शाता है।



