Editorial : दीपों का त्योहार
Editorial: Festival of Lights

Editorial : भारत एक विविधताओं से भरा देश है जहाँ हर त्योहार विशेष महत्व रखता है। इन्हीं त्योहारों में से एक है दीपावली — उजाले, खुशियों और आध्यात्मिक प्रकाश का पर्व। यह न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक समरसता, आर्थिक गतिविधियों और सांस्कृतिक उत्सवों का भी केंद्र बिंदु बन गया है। दीपावली का आगमन होते ही चारों ओर एक विशेष ऊर्जा और उल्लास की अनुभूति होने लगती है।
दीपावली की तैयारियाँ कई सप्ताह पहले से शुरू हो जाती हैं। घरों की सफाई, रंगाई-पुताई, बाजारों की चहल-पहल, मिठाइयों की दुकानों पर बढ़ती भीड़ और सजावट का सामान खरीदने वालों की लंबी कतारें यह दर्शाती हैं कि यह केवल एक दिन का त्योहार नहीं, बल्कि एक संपूर्ण सांस्कृतिक उत्सव है।
हर व्यक्ति अपने स्तर पर इस त्योहार को विशेष बनाने में जुटा रहता है। घर-घर में दीप जलाने की परंपरा न केवल अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है, बल्कि यह सामाजिक और मानसिक स्वच्छता का भी संदेश देती है। बच्चे पटाखों को लेकर उत्साहित रहते हैं, वहीं बड़े-बुजुर्ग पूजा-पाठ की तैयारियों में लगे रहते हैं।
हालांकि, आज के संदर्भ में यह भी आवश्यक है कि हम दीपावली के पर्व को मनाते समय पर्यावरण और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को न भूलें। पटाखों से होने वाला प्रदूषण, प्लास्टिक की सजावट, और जरूरत से ज्यादा उपभोग करने की प्रवृत्ति त्योहार की मूल भावना से भटकाने का काम कर रही है। अतः यह आवश्यक है कि हम ‘हरित दीपावली’ की ओर कदम बढ़ाएँ कम प्रदूषण, अधिक प्रकाश और अधिक खुशियाँ।
इसके साथ ही, हमें समाज के उस वर्ग को भी नहीं भूलना चाहिए जो अभाव में त्योहार मनाता है। यदि हम अपने त्योहार की खुशियों को उनके साथ बाँटें, तो दीपावली सच में “असली उजाला” लेकर आएगी।
Editoral : अफसरशाही की दुनिया में मानसिक तनाव
दीपावली केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि एक जीवन शैली है जिसमें हम अपने भीतर और बाहर के अंधकार को मिटाकर, ज्ञान, प्रेम और करुणा के दीप जलाते हैं। इस पावन अवसर पर यही कामना है कि हर घर में सुख, शांति और समृद्धि का दीप प्रज्ज्वलित हो



