Editorial : महिलाओं पर दहेज उत्पीड़न, एक सामाजिक अभिशाप
Editorial: Dowry harassment on women, a social curse

Editorial : आज भी हमारे समाज में दहेज जैसी कुप्रथा जड़ें जमाए हुए है। शादी के नाम पर दुल्हन और उसके परिवार से धन, गहने, वाहन या अन्य वस्तुएँ माँगना न केवल अमानवीय है, बल्कि यह हमारे कानून और संस्कृति दोनों का घोर अपमान है। दुखद पहलू यह है कि दहेज लोभी मानसिकता के कारण देशभर में अनेक महिलाएँ प्रताड़ना, हिंसा और यहाँ तक कि मौत का शिकार बन रही हैं।
दहेज उत्पीड़न केवल एक पारिवारिक समस्या नहीं, बल्कि यह पूरे समाज के लिए कलंक है। बेटी को वरमाला पहनाने से पहले उसके पिता को अपनी संपत्ति बेचनी पड़े, यह कैसी विडंबना है? विवाह, जो प्रेम और विश्वास का बंधन होना चाहिए, वह लालच और लेन-देन का सौदा बन चुका है। आए दिन अख़बारों और समाचार चैनलों में दहेज हत्या, जलाने या आत्महत्या की खबरें इस घिनौनी मानसिकता का प्रमाण हैं।
हालाँकि भारत में दहेज निषेध अधिनियम और महिलाओं की सुरक्षा के लिए सख्त कानून मौजूद हैं, लेकिन इनका पालन और लागू होना उतना प्रभावी नहीं है। कानून से अधिक जरूरी है समाज की सोच में बदलाव। जब तक लोग बेटी को बोझ समझते रहेंगे और बेटे को कमाई का साधन मानेंगे, तब तक दहेज की जड़ें खत्म नहीं होंगी।
समय आ गया है कि शिक्षा और जागरूकता के माध्यम से इस बुराई का उन्मूलन किया जाए। परिवारों को चाहिए कि वे बिना दहेज विवाह को बढ़ावा दें और ऐसे उदाहरण समाज में प्रस्तुत करें, जिससे अन्य लोग प्रेरित हों। दहेज माँगने वालों का सामाजिक बहिष्कार ही सबसे बड़ा दंड है।
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नारी केवल गृहस्थी की आधारशिला ही नहीं, बल्कि राष्ट्र की शक्ति है। उसे अपमानित करना पूरे समाज को कमजोर करना है। दहेज उत्पीड़न जैसी बुराई से हमें मिलकर लड़ना होगा, तभी सच्चे अर्थों में महिलाओं को सम्मान और समानता मिल सकेगी।



