Editorial : भटके कुत्तों का संकट और समाधान
Editorial: The crisis of stray dogs and the solution

Editorial : भारत में समस्याओं की कमी नहीं है। जनसंख्या, प्रदूषण, ट्रैफिक या फिर आवारा पशुओं की दिक्कत—हर ओर कोई न कोई चुनौती मौजूद है। दिल्ली जैसे महानगरों में आवारा कुत्तों की समस्या लंबे समय से लोगों की चिंता का विषय बनी हुई है। आए दिन कुत्तों के हमलों की खबरें आती हैं, कई मामलों में लोगों की जान तक चली जाती है। यह स्थिति केवल दिल्ली तक सीमित नहीं, बल्कि लगभग हर बड़े शहर में आम है।
28 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने इस गंभीर समस्या का स्वतः संज्ञान लिया और 28 अगस्त को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए निर्देश दिया कि आठ सप्ताह के भीतर एनसीआर क्षेत्र से आवारा कुत्तों को पकड़कर शेल्टर होम भेजा जाए। साथ ही उनकी नसबंदी करने के आदेश भी दिए गए, ताकि उनकी संख्या नियंत्रित हो सके। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आदेश के पालन में बाधा डालने वालों पर सख्त कार्रवाई होगी।
हालाँकि, इस कदम का कुछ पशुप्रेमी संगठनों ने जोरदार विरोध किया और अदालत में याचिकाएँ भी दाखिल कीं। उनकी दलील है कि जानवरों को कैद करना अमानवीय है। अब इन याचिकाओं पर तीन जजों की खंडपीठ सुनवाई करेगी।
यह सही है कि आवारा कुत्तों की समस्या गंभीर है, लेकिन अदालत का सुझाया समाधान पूरी तरह व्यावहारिक नहीं लगता। देशभर में ऐसे कुत्तों की संख्या लाखों में है, जबकि शेल्टर होम बेहद कम हैं।
लाखों कुत्तों के लिए पर्याप्त आश्रय-स्थल बनाना सरकार के लिए जमीन, संसाधन और बजट—तीनों ही स्तर पर कठिन है। इसके लिए भारी संख्या में कर्मचारियों की भर्ती और खर्च की आवश्यकता होगी, जो करोड़ों रुपए का बोझ बनेगा।
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ऐसे में जरूरी है कि सरकार और समाज मिलकर संतुलित रास्ता निकालें। नसबंदी और टीकाकरण को प्राथमिकता देते हुए चरणबद्ध योजना बनाई जाए। मोहल्ला स्तर पर सामुदायिक शेल्टर या फोस्टर सिस्टम अपनाया जा सकता है। साथ ही नागरिकों में जागरूकता फैलाई जाए कि कुत्तों को खाना खिलाने के साथ-साथ उनके टीके और नसबंदी पर भी ध्यान दें।
सच्चाई यह है कि समस्या गंभीर है और अनदेखी नहीं की जा सकती। लेकिन समाधान केवल अदालत के आदेश या भावनात्मक विरोध में नहीं, बल्कि व्यावहारिक, संतुलित और दूरगामी योजना में छिपा है।



