Editorial : हिन्दी साहित्य के पितामह
Editorial: Father of Hindi Literature

Editorial : भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय साहित्यकारों, पत्रकारों में से थे मुंशी प्रेमचंद्र जिन्होंने असहमति का साहस और सहमति का विवेक विकसित करने के लिए समाज की विसंगतियों की पहचान की, साथ ही जनशक्ति को संगठित करने के लिए पत्रकारिता की उज्ज्वल मशाल भी जलाई।
मौजूदा समय में प्रेमचंद की प्रासंगिकता और अधिक है। प्रेमचंद जब साहित्य की विभिन्न विधाओं -कहानी, उपन्यास, नाटक और दूसरी विधाओं में लिख रहे थे, देश अंग्रेजी दासता के खिलाफ एकजुट होकर लड़ रहा था। वे तीन दशक तक वह पत्रकारिता जगत में छाए रहे।
स्वदेश, आज, मर्यादा आदि कपत्रों से वह संबद्ध रहे और असहयोग आंदोलन के जमाने में स्तंभकार के रूप में प्रसिद्ध थे। प्रेमचंद ने सक्रिय राजनीति में हिस्सा नहीं लिया, लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन में उनका योगदान किसी भी राजनेता से कम नहीं है। आधुनिक हिन्दी साहित्य के पितामह और उपन्यास सम्राट महान् कथाकार मुंशी प्रेमचंद ने अपने लेखन के माध्यम से न सिर्फ दासता के विरुद्ध आवाज उठाई बल्कि लेखकों के उत्पीड़न के विरुद्ध भी सक्रिय भूमिका निभाई।
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प्रेमचंद ऐसे कहानीकार और साहित्यकार थे, जिन्हें आज भी सबसे ज्यादा पढ़ा जाता रहा है। उन्हें ‘आम आदमी का साहित्यकार’ भी कहा जाता है। चूंकि उनकी लगभग सभी कहानियां आम जीवन और उसके सरोकारों से ही जुड़ी होती थी, इसीलिए उनके सबसे ज्यादा पाठक आम लोग रहे हैं।
उन्होंने अपनी लगभग सभी रचनाओं में आम आदमी की भावनाओं, उनकी परिस्थितियों, समस्याओं तथा संवेदनाओं का मार्मिक शब्दांकन किया। आज भी हिन्दी भाषी दिग्गज लेखकों और साहित्यकारों का यही मानना है कि मुंशी प्रेमचंद जैसा कलमकार हिन्दी साहित्य में न आज तक कोई हुआ है और न होगा।
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वैसे तो उन्होंने 13 वर्ष की उम्र में लेखन कार्य शुरू कर दिया था लेकिन उनके लेखन में परिपक्वता शिवरानी से विवाह के बाद ही आई थी, जिससे उनके लेखन की मांग बढ़ने लगी। उनकी दूसरी पत्नी शिवरानी ने ही बाद में उनकी जीवनी लिखी थी।



