Editiorial : बिहार की राजनीति में उठते बवंडर
Editorial: Storm rising in Bihar politics

Editiorial : बिहार में आगामी विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही राज्य की राजनीति में जबरदस्त हलचल शुरू हो गई है। सभी प्रमुख राजनीतिक दल अपनी-अपनी जमीन मजबूत करने में जुटे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी तक, हर कोई जनता को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए रैलियों और नारों की बौछार कर रहा है।
चुनावी मौसम आते ही बिहार में ‘जंगलराज’ और ‘गुंडाराज’ जैसे शब्दों का प्रयोग आम हो जाता है। इस बार भी वही दृश्य दोहराया जा रहा है। कांग्रेस ने नीतीश सरकार पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने में नाकाम रहने का आरोप लगाया है, वहीं राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने हालिया हिंसक घटनाओं को “सरकारी अपराध” बताते हुए राज्य में अराजकता की वापसी की चेतावनी दी है।
पिछले कुछ समय में राज्य में घटित आपराधिक घटनाओं ने इस बहस को और गहरा कर दिया है। अस्पतालों में गोलीबारी, पुलिस थानों पर हमले और नेताओं के खिलाफ गंभीर आरोप, इन सभी ने बिहार की प्रशासनिक स्थिति को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
सबसे बड़ी हलचल तब हुई जब बिहार सरकार के नगर विकास एवं आवास मंत्री जीवेश मिश्रा को, 15 साल पुराने नकली दवा घोटाले में, राजस्थान की राजसमंद कोर्ट ने 4 जून 2025 को दोषी ठहराया। उनके साथ 8 और लोग भी इस मामले में दोषी पाए गए। इस खबर ने न केवल सरकार की छवि को प्रभावित किया, बल्कि जनता के बीच भरोसे की दीवार को भी हिलाया है।
इस बीच भाजपा के अन्य नेताओं पर भी गंभीर आरोप लगे हैं। आरा में भाजपा नेता बबलू सिंह द्वारा मामूली विवाद के बाद दो लोगों की गोली मारकर हत्या करना एक चौंकाने वाला उदाहरण है। वहीं एक अन्य मामले में, भाजपा नेता आलोक कुमार चौहान पर 150 लोगों की भीड़ के साथ थाने पर हमला करने और पुलिस अधिकारी की वर्दी फाड़ने का आरोप है।
ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि हाल ही में राज्य में हुई 31 हत्याओं में से कई मामलों में राजनीतिक प्रभाव की आशंका जताई जा रही है। पटना में भाजपा नेता विक्रम झा और व्यवसायी गोपाल खेमका की हत्याएं भी कानून व्यवस्था की कमजोरी की ओर इशारा करती हैं।
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इन घटनाओं के आलोक में यह ज़रूरी हो जाता है कि चुनावी भाषणों और वादों से इतर राजनीतिक दल राज्य में कानून-व्यवस्था को लेकर ठोस रणनीति पेश करें। केवल दूसरे पर दोषारोपण करने से कोई समाधान नहीं निकलेगा। जनता अब केवल वादे नहीं, परिणाम देखना चाहती है। बिहार की राजनीति को यदि भरोसेमंद और पारदर्शी बनाना है, तो अपराध और सत्ता के गठजोड़ को तोड़ना ही होगा।



