Editorial : बिहार विधानसभा चुनाव में बेरोजगारी मुख्य मुद्दा

Editorial: Unemployment is the main issue in Bihar assembly elections

Editorial : विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मतदाता सूचियों के विशेष सघन पुनरीक्षण अभियान पर संदेह के सवालों के साथ मुखर विपक्षी दल इसके खिलाफ राजनीतिक लड़ाई के साथ ही कानून विकल्पों पर भी गंभीरता से विचार कर रहे हैं। बिहार में बेरोजगारी चुनावी चर्चा का मुख्य मुद्दा है। युवा खासकर उच्चशिक्षित वर्ग नौकरी की तलाश में है। 35 प्रतिशत आरक्षण के साथ-साथ सरकार ने वेकेंसी क्रिएशन, युवा आयोग गठन, कृषि व सड़क इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च जैसे उपाय किए है।

2025 के बिहार चुनाव बहुआयामी लड़ाई से परिपूर्ण है, जातिगत समीकरण, युवा और ग्रामीण विकास, मतदाता सूची संशोधन जैसे मुद्दों ने चुनावी माहौल को गहराई दी है। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मतदाता सूचियों के विशेष सघन पुनरीक्षण अभियान पर संदेह के सवालों के साथ मुखर विपक्षी दल इसके खिलाफ राजनीतिक लड़ाई के साथ ही कानून विकल्पों पर भी गंभीरता से विचार कर रहे हैं।

इस बीच, एनडीए की सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी के नेता चिराग पासवान ने एनडीए से दूरी बनाते हुए बिहार की सभी 243 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का संकेत देकर सियासी परिदृश्य को दिलचस्प बना दिया है। चुनावों की दशा एवं दिशा बदलने में महत्वपूर्ण एवं निर्णायक किरदार निभाने के कारण ही हरेक राजनीतिक दल महिला वर्ग को आकर्षित करने में जुट गया है।

राजद-कांग्रेस-वाम दलों का महागठबंधन ‘माई-बहिन मान योजना’ के तहत महिलाओं को प्रतिमाह 2, 500 रुपये देने का वायदा कर चुका है, तो राजद नेता तेजस्वी यादव बेरोजगारी और डोमिसाइल के मुद्दे को जोर-शोर से उठा रहे हैं। बिहार उन शुरुआती राज्यों में एक है, जिसने पंचायत और स्थानीय निकायों में आधी आबादी के लिए पचास फीसदी सीटें आरक्षित की हैं।

इस कदम ने यहां की स्त्रियों में जबर्दस्त राजनीतिक जागरूकता पैदा की है। ऐसे में, नीतीश सरकार के इस नीतिगत दांव को समझा जा सकता है। जातिगत और स्थानीय समीकरण भुनाने के लिए निश्चित ही यह एक संगठित चाल है, जहां जाति और आवासीयता दोनों को आधार बनाया गया।

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बिहार की राजनीति इस बार स्थानीयता, जातिगत समीकरण और सामाजिक कल्याण के मिश्रित आरोपणों के बीच गंभीर मुठभेड़ के दौर से गुजर रही है। चुनाव नतीजे यह तय करेंगे कि क्या यह रणनीतियाँ सचमुच सतत परिवर्तन की ठोस बुनियाद रखेंगी, या चुनावी भाषण के बाद हवा में खो जाएँगी।

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