Editorial : गुरु-शिष्य का महामहोत्सव
Editorial : The great festival of the master-disciple

Editorial : गुरु पूर्णिमा सन्मार्ग एवं सत-मार्ग पर ले जाने वाले महापुरुषों के पूजन का पव र्है, जिन्होंने अपने त्याग, तपस्या, ज्ञान एवं साधना से न केवल व्यक्ति को बल्कि समाज, देश और दुनिया को भवसागर से पार उतारने की राह प्रदान की है।
भारतीय लोकचेतना में सत्य की ओर गति कराने एवं जीवन को जीवंतता देने वाले गुरु को ईश्वर माना गया है। भारत भुमि में अनेकों अवतारों, ऋषि-मुनियों, देवों, संत-साधु फकीरों व सच्चे साम्थर्य गुरुओं की पहली पंसद रही है। जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण विभिन्न युगों में स्वयं भगवान विभिन्नअवतारों के रूप में ना अवतरित हो कर मानव का कल्याण किया है।
हमारे यहाँ गुरु-शिष्य की परम्परा अति प्राचीन है। जिसका वर्णन हमारे वेद, पुराण व शास्त्रों में उल्लेख है। इसी श्रंखला में जब मानव त्रितापो से त्रस्त है, वह अपने उपर माया के आवरण व अज्ञानता के अंधकार में भटक रहा है। गुरु एक नाम नहीं, एक स्थिति है। वे केवल शरीरधारी व्यक्ति नहीं, एक दिव्य ऊर्जा हैं, जो हमारे भीतर शक्ति, ज्ञान एवं संस्कार को जागृत करती है।
कबीरदास ने कहा- गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय? यह केवल काव्यात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक चेतना की वह आधारशिला है, जिस पर जीवन की संपूर्ण संरचना टिकी है। गुरु-शिष्य का संबंध केवल औपचारिक नहीं, आत्मिक होता है।
शिष्य का अर्थ ही है-‘जो शीघ्र ग्रहण करे, जो समर्पित हो।’ और गुरु का अर्थ है-‘गु’ यानी अंधकार और ‘रु’ यानी प्रकाश-जो अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाए।
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प्राचीन गुरुकुल परंपरा में यह संबंध अत्यंत पवित्र और जीवनपर्यंत टिकने वाला होता था। शिष्य केवल विद्या ही नहीं, गुरु के जीवन से भी सीखता था। गुरु केवल उपदेश नहीं देता, वह जीता है। उसकी हर बात, हर चुप्पी, हर दृष्टि, हर मौन एक शिक्षा होती है। उसका जीवन एक ग्रंथ होता है, जिसकी हर बात शिष्य के जीवन में अमिट छाप छोड़ती है। शास्त्रों में कहा गया है गुरु बिना गति नहीं, गुरु बिना ज्ञान नहीं, गुरु बिना मोक्ष नहीं। गुरु ही शिष्य के अंतर्मन में आत्मा की चिंगारी प्रज्वलित करता है।



