Editorial : दिल्ली की राजनीति में अब सवाल
Editorial : The question is now in the politics of Delhi

Editorial : दिल्ली में सत्ता परिवर्तन को एक महीना बीतने को आया, केबिनेट बन चुकी है। नई सरकार ने सत्ता संभालते ही दिल्ली की वित्तीय स्थिति को लेकर सवाल उठाए। बार-बार यह कहा जा रहा है कि खजाना खाली है, पहले की सरकार ने जनता को भ्रम में रखा। इसी के साथ कैग रिपोर्ट का हवाला देकर कई विभागों की खामियां गिनाई जा रही हैं, खासकर स्वास्थ्य विभाग को लेकर। लेकिन सवाल यह है कि क्या कैग रिपोर्ट के आधार पर ही अब सरकार आगे बढ़ेगी?
क्या नई सरकार का काम सिर्फ पिछली सरकार की गलतियां गिनाना भर रह गया है? क्या खुद कुछ नया करने की जिम्मेदारी से बचा जा सकता है? नई सरकार की सबसे बड़ी चुनौती है स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाना। कैग रिपोर्ट में जरूर खामियां गिनाई गई हैं, लेकिन इस हकीकत से कोई इंकार नहीं कर सकता कि दिल्ली के सरकारी अस्पताल अब भी गरीबों के लिए ऑक्सीजन मशीन बने हुए हैं।
एनसीआर से हर दिन हजारों लोग दिल्ली के अस्पतालों की ओर दौड़ते हैं। एम्स, सफदरजंग, लोकनायक, जीटीबी, बाबा साहेब अंबेडकर, दीनदयाल उपाध्याय जैसे बड़े अस्पताल हर रोज लाखों मरीजों का इलाज करते हैं। सुविधाओं की कमी के बावजूद यह अस्पताल गरीबों के लिए एक बड़ी राहत बने हुए हैं।
दिल्ली सरकार के मोहल्ला क्लीनिक मॉडल को लेकर भी बहस हो रही है। नए मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री इसे कितना आगे बढ़ाएंगे, यह देखने वाली बात होगी। नई सरकार बार-बार कह रही है कि खजाना खाली है।
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सवाल यह है कि अगर खजाना खाली है तो क्या अब विकास कार्य रुक जाएंगे? क्या जनता अब इंतजार करे कि सरकार सिर्फ पिछली सरकार की नाकामियों पर चर्चा करती रहे? अगर दिल्ली की जनता ने सरकार बदली है तो यह उम्मीद भी की थी कि कुछ नया देखने को मिलेगा। नई सरकार को अब जल्द से जल्द अपने वादों को अमलीजामा पहनाना होगा।
दिल्ली की राजनीति में अभी बहुत शोर है। मगर जनता को इस शोर से कोई फर्क नहीं पड़ता। उन्हें सिर्फ यह देखना है कि सरकार उनके लिए क्या कर रही है। तो नई सरकार के लिए बड़ा सवाल यह है-क्या अबसिर्फ और सिर्फ बहस होगी या फिर बदलाव भी दिखेगा?



