Editorial : सूर्य-स्नान

Editorial : सूर्य-स्नान एवं सूर्य नमस्कार के चमत्कारों से तो सभी परिचित हैं। यूरोपीय देशों में सूर्य-स्नान काफी लोकप्रिय है, जबकि सूर्य नमस्कार के रूप में किये जाने वाले व्यायाम से शरीर स्वस्थ, बलिष्ठ, निरोगी एवं दीर्घजीवी होता है। सूर्य इस संसार के जीवन-दाता, पालक और आरोग्य-दाता है। इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है ज्योतिषां रविरंशुमान। इस तरह भारत में सूर्य आदिकाल से ही जन-आस्था, श्रद्धा, आराधना एवं उपासना का केंद्र रहा है। भारत के विभिन्न भागों में बने भव्य सूर्य मंदिर इस तथ्य को उजागर करते हैं कि हर युग में भारत में सूर्य की आराधना एवं उपासना प्रचलित रही है। भारत में सूर्य-उपासना वैदिक काल से ही प्रचलित है। सूर्य-उपासक भगवान सूर्य को इस पृथ्वी का जनक, पालक और विनाशक मानते हैं। उनकी मान्यता है कि यदि सूर्य नहीं होता, तो न यह पृथ्वी होती और न ही जीवन होता। यह मान्यता विज्ञान के सिद्धांतों के भी बहुत निकट है। सूर्य की उपासना से कुष्ठ-रोग दूर होने की कई धार्मिक कथाएं प्रचलित हैं। भगवान कृष्ण के पुत्र साम्ब को जब कुष्ठ रोग हुआ था, तो उसने भगवान सूर्य की उपासना की थी, जिससे उसका यह असाध्य रोग दूर हो गया था। उड़ीसा में कोणार्क का सूर्य मंदिर आज जिस स्थान पर बना हुआ है, कहा जाता है, वहीं साम्ब ने तपस्या की थी। सूर्य के उत्तरायण में होने का भारत में कितना महत्व है, इसका प्रमाण हमें महाभारत में मिलता है। भीष्म पितामह ने दक्षिणायण के सूर्य के समय अपनी देह नहीं त्यागी थी, क्योंकि वे स्वर्ग में प्रवेश उत्तरायण के सूर्य में करना चाहते थे। भारतीय ग्रंथों में सूर्य को आरोग्य-दाता कहा जाता है। संक्रमण रोगों का प्रकोप ऐसे स्थानों पर होता है, जहां सूर्य की रश्मियां नहीं पहुंच पाती। सूर्य की रश्मियां पृथ्वी पर स्थित रोग-जनक कृमियों को नष्ट कर प्राणियों एवं वनस्पतियों को शक्ति प्रदान करती हैं।

Vijay kumar, Editor

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