Editorial: मुफ्त उपहार
Editorial: Free Gifts
Editorial: खुशहाल देश और समाज वही माना जाता है, जहां लोग निजी उद्यम से अपने गुजर-बसर संबंधी सुविधाएं जुटाते हैं। खैरात पर जीने वाला समाज विपन्न ही माना जाता है। लोग भी यही चाहते हैं कि उन्हें कुछ करने को काम मिले। इसी से उन्हें संतोष मिलता है। मुफ्त की सुविधाएं पाने वाले तमाम लोग अपनी आय बढ़ाने के जतन करना छोड़ देते हैं। दिल्ली में महिलाओं एवं किन्नरों को भी डीटीसी बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा की घोषणाएं की गयी है, जिन्हें इस तरह की सुविधा की जरूरत नहीं। आधी आबादी को मुफ्त यात्रा की सुविधा देने से दिल्ली में डीटीसी को हर साल करोड़ों रुपये तक का नुकसान हुआ है। आम आदमी पार्टी मतदाताओं को लुभाने की कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही है। चुनावों में मुफ्त की घोषणाएं करना कोई नया चलन नहीं है। अपने देश में रेवड़ियां बांटने का वादा और फिर उन पर जैसे-तैसे और अक्सर आधे-अधूरे ढंग से अमल का दौर चलता ही रहता है। लोकलुभावन वादों को पूरा करने की लागत अंतत: मतदाताओं को खासकर करदाताओं को ही वहन करनी पड़ती है। चुनाव से पहले अब आम आदमी पार्टी ने एक ऐसी लुभावनी, मतदाताओं को आकर्षित करने की योजना की घोषणा की है जिसके अन्तर्गत मंदिरों के पुजारियों और गुरुद्वारा साहिब के ग्रंथियों को 18 हजार रुपए महीने दिए जाएंगे। इस योजना का नाम पुजारी-ग्रंथी योजना है। ‘मुफ्त की सौगातÓ राजनीतिक फायदे के लिए जनता को दाना डालकर फंसाने वाली पहल है, एक तरह से दाना डालकर मछली पकड़ने जैसा है। ऐसी सौगातें सिर्फ गरीबों के लिए नहीं बल्कि सभी के लिए होती है, जिसके पीछे आम आदमी पार्टी के संयोजक जैसे राजनेताओं का एकमात्र उद्देश्य देश में अपनी और अपनी पार्टी का प्रभुत्व स्थापित करना है। रेवड़ी संस्कृति अर्थव्यवस्था को कमजोर करने के साथ ही आने वाली पीढ़ियों के लिए घातक भी साबित होती है। इससे मुफ्तखोरी की संस्कृति जन्म लेती है। इस राशि का उपयोग दिल्ली के इन्फ्रास्ट्रक्चर पर किया जा सकता है।



