Editorial : परिवहन नियमों का सख्ती से पालन जरूरी

Editorial: Strict adherence to transport rules is necessary

Editorial: Strict adherence to transport rules is necessary
Editorial: Strict adherence to transport rules is necessary

Editorial: देश भर में बसों के रख-रखाव, उनके परिचालन, ड्राइवरों की योग्यता और अन्य मामलों में एक-समान मानक लागू करने की जरूरत है, तभी देश के नागरिक एक राज्य से दूसरे राज्य में निश्चिंत होकर यात्रा कर सकेंगे। केवल चालान काटना समस्या का समाधान नहीं है परिवहन नियमों का सख्ती से पालन जरूरी है।

देश में 30 प्रतिशत ड्राइविंग लाइसेंस फर्जी हैं। परिवहन क्षेत्र में भारी भ्रष्टाचार है लिहाजा बसों का ढंग से मेनटेनेंस भी नहीं होता। इनमें बैठने वालों की जिंदगी दांव पर लगी होती है। भारत में सड़क दुर्घटनाएं मौतों और चोटों के प्रमुख कारणों में से एक रही हैं। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारत की जीडीपी का करीब तीन से पांच फीसदी हिस्सा सड़क हादसों में लगा है।

वाकई भारत की सड़कों पर चलना अब जान हथेली में रखकर चलने जैसा ही होता जा रहा है। ये कातिल सड़क हादसे गंभीर एवं चुनौतीपूर्ण है। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि ऐसी दुर्घटनाओं में निर्दोष लोग ही मारे जाते हैं। देश की इन कातिल एवं खूनी सड़कों की हकीकत बताता केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय का एक डराने वाला आंकड़ा पिछले दिनों सामने आया। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर वर्ष 13 लाख से अधिक लोग सड़क हादसों के शिकार व्यक्ति की मौत हो जाती है। मंत्रालय के अनुसार पिछले दस सालों में हुए सड़क हादसों में 15 लाख लोग मारे गए।

कमोबेश सारे देश में ऐसी घटनाएं सुनने में आती हैं जिनमें रोज सैकड़ों लोगों की जीवन लीला समाप्त हो जाती है। जरूरत है सड़कों के किनारे अतिक्रमण को दूर करने की, आवारा पशुओं के प्रवेश एवं बेघड़क घुमने को भी रोकने की। ये दोनों ही स्थितियां सड़क हादसों का कारण बनती है। यह भी समझने की जरूरत है कि सड़क किनारे बसे गांवों से होने वाला हर तरह का बेरोक-टोक आवागमन भी जोखिम बढ़ाने का काम करता है। यह गंभीर चिंता का विषय है कि सड़कों पर बेलगाम गाड़ी चलाना कुछ लोगों के लिए मौज-मस्ती एवं फैशन का मामला होता है लेकिन यह कैसी मौज-मस्ती या फैशन है जो कई जिन्दगियां तबाह कर देती है।

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