Editorial : जलवायु परिवर्तन
Editorial : Climate Change

वैश्विक रेटिंग एजेंसी मूडीज द्वारा जारी पर्यावरण जोखिम की रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि भारत में पानी की कमी तथा जलवायु परिवर्तन के कारण आपदाओं की संख्या में बढ़ोतरी से भारत की साख पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। जल संकट से खेती और औद्योगिक गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं तथा खाद्य पदार्थों की महंगाई एवं आमदनी में कमी सामाजिक अस्थिरता का कारण भी बन सकती हैं।
जल प्रबंधन में निवेश बढ़ाना समझदारी की बात होगी क्योंकि ऐसा कभी न कभी करना ही होगा, इसलिए अभी से हमें अपने प्रयासों को तेज करना चाहिए ताकि समय रहते समस्या का समाधान हो सके और हम भारी नुकसान से बच सकें। खेती, भवन निर्माण, उद्योग आदि में भूजल का बेतहाशा दोहन हो रहा है।
देश के कई जिलों में भूजल का स्तर बहुत नीचे चला गया है। बारिश के पानी को बचाने के लिए इमारतों में व्यवस्था करने के प्रावधान हैं, पर इस संबंध में निगरानी की कमी है। यह संरक्षण केवल बड़ी इमारतों के भरोसे नहीं छोड़ा जाना चाहिए, बल्कि इसके लिए हर घर में उपाय होने चाहिए। दिल्ली में कृत्रिम झीलें बनी हैं, जिनमें रिसाइकल पानी डाला जाता है। ऐसे प्रयासों से भूजल स्तर बढ़ा है। इस तरह के उपाय समूचे देश में होने चाहिए।
तालाबों, जलाशयों और झीलों को बचाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। शहरीकरण से सबसे अधिक नुकसान जलाशयों का ही हुआ है। जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली बहुत अधिक बारिश से जल इंफ्रास्ट्रक्चर को भी नुकसान होता है। अगर बारिश की कुल मात्रा को देखा जाए, तो उसमें कमी आ रही है। साल 2023 में 1971 से 2020 तक के औसत से छह प्रतिशत कम बारिश हुई थी। पेयजल उपलब्ध कराने के भी प्रयास हो रहे हैं। इस संबंध में ठोस नियमन नहीं होने से रियल एस्टेट कारोबारी झीलों-तालाबों को पाटकर इमारतें बना देते हैं, इसे रोका जाना चाहिए।



