क्षेत्रीय मुद्दों और क्षेत्रीय दलों का प्रभाव
Regional issues and influence of regional parties
देश के सबसे ज्यादा संसदीय 80 सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश में मायावती, मुलायम सिंह और अखिलेश यादव को जब भी सत्ता का सुख मिला है, उसमें यही राजनीति के गुण शामिल रहे हैं। यही सब दक्षिण भारत के राज्यों में क्षेत्रीय क्षत्रपों का दबदबा देखने में आया। क्षेत्रीय दलों की राजनीतिक ताकत स्थानीय मुद्दे और जातीयता होती है। दस साल बाद इस चुनाव में एक बार फिर क्षेत्रीय मुद्दों और क्षेत्रीय दलों का प्रभाव दिखाई दिया है। तमिलनाडु में स्टालिन की द्रमुक ने इंडिया गठबंधन के साथ मिलकर राज्य की सभी 39 सीटों पर जीत दर्ज करा ली है। आप के साथ मिलकर कांग्रेस ने पंजाब में सभी 10 सीटें इंडिया गठबंधन के खाते में डलवा दी। बीते सालों में महाराश्ट्र और हरियाणा में भाजपा-षिवसेना, अकाली दल और इनेलो से दषकों से चले आ रहे गठबंधनों का टूटना इन्हीं आषयों के परिणाम थे। लेकिन अब आए चुनाव परिणामों ने अकेली भाजपा को 240 सीटों पर सिमटा दिया। हालांकि उसके नेतृत्व वाले राजग गठबंधन के पास 291 सीटें हैं।
लेकिन भाजपा खुद 272 सीटें लाई होती तो उसकी पूर्व की तरह ठसक बनी रहेती। बावजूद नरेंद्र मोदी नेहरू के बाद ऐसे अकेले प्रधानमंत्री हैं, जिन्हें मतदाता ने लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बने रहने का जनादेश दिया है। लेकिन भाजपा गठबंधन में सहयोगी रहे जिस राज्य में भाजपा को सबसे बड़ा झटका लगा है, उसमें महाराश्ट्र प्रमुख है। 2014 और 2019 में महाराश्ट्र की 48 सीटों में से भाजपा-षिवसेना को 41 सीटें मिली थीं। 2019 के विधानसभा चुनाव में स्पश्ट बहुमत के बावजूद मुख्यमंत्री पद को लेकर दोनों दलों में बिगड़ गई। क्षेत्रीय क्षत्रपों में सबसे बड़ी ताकत के रूप में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी आई है। उसने 80 सीटों में से 37 सीटें जीतकर अपनी मजबूत आमद लोकसभा में दर्ज करा दी है। यहां से अब बसपा के सूपड़ा साफ होने का लाभ भी सपा को मिला है। राम मंदिर निर्माण के बावजूद भाजपा के लिए यहां से मिलीं अप्रत्याषित पराजय ने यह तय कर दिया है कि भारत में क्षेत्रीयता और जातीयता अभी भी चुनाव में ईष्वर से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है।



