Editorial : लोकतंत्र के महापर्व

Great festivals of democracy

Editorial: Great festivals of democracy

Editorial : 18वें लोकसभा चुनावों की सरगर्मियां दिन ब दिन तेज होती जा रही है। धर्म, जाति, राजनीति-सत्ता और प्रांत के नाम पर नए संदर्भों में समस्याओं ने पंख फैलाये हैं। लोकतंत्र के महापर्व पर समझना चाहिए कि हमने जीने का सही अर्थ ही खो दिया है। यद्यपि बहुत कुछ उपलब्ध हुआ है। कितने ही नए रास्ते बने हैं। फिर भी किन्हीं दृष्टियों से हम भटक रहे हैं।

देश के लोकतंत्र को हांकने वाले लोग इतने बदहवास होकर निर्लज्जतापूर्ण कारनामे करेंगे कि इसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। आम आदमी सरकार ने शराब-शिक्षा में घोटाले किए, दागी चिन्हित भी हुए लेकिन आप सरकार ने भ्रष्टाचार को लेकर दोहरे मापदंड अपना लिए। अपनों द्वारा किया गया भ्रष्टाचार कोई भ्रष्टाचार नहीं, राबर्ट वाड्रा के खिलाफ कुछ नजर नहीं आता और वे चुनाव लड़ने की बात करते हैं।

बात केवल कांग्रेस की ही नहीं है, बात राजनीतिक आदर्शों की हैं। जिसकी वकालत करते हुए कभी अन्ना हजारे तो कभी बाबा रामदेव, कभी केजरीवाल तो कभी श्री रविशंकरजी जन-आन्दोलन की अगवाई करते देते थे, अब ना तो ऐसे आन्दोलन होते हैं न ही उन पर विश्वास रहा। हमारे भीतर नीति और निष्ठा के साथ गहरी जागृति की जरूरत है।

भाजपा जो हमेशा राजनीतिक शुचिता की बात करती रही, उसकी शुचिता कहां है? कितने दागी एवं अपराधी नेताओं को उसने अपने दल में सदस्यता के साथा-साथ टिकट भी दे दिया। हो सकता है 400 के बड़े लक्ष्य को हासिल करने के लिये भाजपा की कुछ मजबूरियां हो। कमल तो खिलेगा ही, लेकिन उस खिलाहट में मजबूरियों के नाम पर मूल्यों के साथ समझौता नहीं होता तो यह लोकतंत्र को स्वस्थ बनाने का एक अनूठा उदाहरण होता।

इन्दिरा गांधी ने कभी कहा था कि व्यक्ति को अपने जन्म से नहीं बल्कि कर्म से पहचाना जाना चाहिए यह वाक्य राहुल गांधी पर भी लागू हो रहा है। वे तमाम सुखों एवं सुविधाओं में पले-बढ़े और उन्होंने जीवन में कोई संघर्ष नहीं किया या ये कहें कि जीवन के लिए संघर्ष करने की उनके सामने कोई नौबत नहीं आई।

वोट बैंक की राजनीति ने सामाजिक व्यवस्था को क्षत-विक्षत करके रख दिया है। ऐसा लगता है कि सब चोर एक साथ शोर मचा रहे हैं और देश की जनता बोर हो चुकी हैं। हमें अतीत की भूलों को सुधारना और भविष्य के निर्माण में सावधानी से आगे कदमों को बढ़ाना।

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