डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर ने संकीर्ण सोच से ऊपर उठकर जीना सिखाया

Dr. Babasaheb Ambedkar taught us to live above narrow mindedness.

Dr. Babasaheb Ambedkar taught us to live above narrow mindedness.

संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अम्बेडकर महान समाज सुधारक और विद्वान थे। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन जातिवाद
को खत्म करने और गरीब, दलितों, पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए अर्पित किया। श्रमिकों, किसानों और महिलाओं के अधिकारों का समर्थन भी किया था। वे स्वतंत्र भारत के प्रथम विधि एवं न्याय मन्त्री, भारतीय संविधान के जनक एवं भारत गणराज्य के निर्माताओं में से एक थे। अम्बेडकर के दादा का नाम मालोजी सकपाल था, तथा पिता का नाम रामजी सकपाल और माता का नाम भीमाबाई था। 1896 में आम्बेडकर जब पाँच वर्ष के थे तब उनकी माँ की मृत्यु हो गई थी।

इसलिए उन्हें बुआ मीराबाई ने संभाला था, जो उनके पिता की बडी बहन थी। मीराबाई के कहने पर रामजी ने जीजाबाई से पुनर्विवाह किया, ताकि बालक भीमराव को माँ का प्यार मिल सके। बालक भीमराव जब पाँचवी अंग्रेजी कक्षा पढ रहे थे, तब उनकी शादी रमाबाई से हुई। रमाबाई और भीमराव को पाँच बच्चे भी हुए – जिनमें चार पुत्र यशवंत, रमेश, गंगाधर, राजरत्न और एक पुत्री इन्दु थी। किंतु 'यशवंत' को छोड़कर सभी संतानों की बचपन में ही मृत्यु हो गई थीं।

प्रकाश, रमाबाई, आनंदराज तथा भीमराव यह चारो यशवंत अम्बेडकर की संताने हैं। अम्बेडकर विपुल प्रतिभा के छात्र थे। उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स दोनों ही विश्वविद्यालयों से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधियाँ प्राप्त कीं तथा विधि, अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में शोध कार्य भी किये थे। व्यावसायिक जीवन के आरम्भिक भाग में ये अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे एवं वकालत भी की तथा बाद का जीवन राजनीतिक गतिविधियों में अधिक बीता। इसके बाद उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए प्रचार और चर्चाओं में शामिल हो गए और पत्रिकाओं को प्रकाशित करने, राजनीतिक अधिकारों की वकालत करने और दलितों के लिए सामाजिक स्वतंत्रता की वकालत की और भारत के निर्माण में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर को संविधान का निर्माता (Father of Indian Constitution) कहा जाता है, लेकिन इन्हें यह नाम यूं नहीं मिला,इसके पीछे भी एक कहानी है। देश को आजाद होने के बाद भारत का नया संविधान तैयार करने के लिए 29 अगस्त, 1947 को एक ड्राफ्टिंग कमेटी का गठन किया गया। इसमें 7 सदस्य थे और कमेटी का अध्यक्ष अम्बेडकर को बनाया गया। संविधान का लिखित प्रारूप पेश करना ही इनकी जिम्मेदारी थी। संविधान को बनने में 2 साल, 11 माह और 17 दिन का समय लगा। भारतीय संविधान पर संविधान सभा के जिन 284 सदस्यों ने हस्ताक्षर किए, उनमें 15 महिलाएं भी शामिल थीं। संविधान को तैयार करने में डॉ.भीमराव अम्बेडकर ने जो भूमिका अहम भूमिका निभाई, उसके कारण उन्हें ‘संविधान निर्माता’ कहा गया। एक लम्बा समय लगने के बाद भारत का संविधान तैयार हुआ। भले ही अम्बेडकर को सिर्फ ड्राफ्टिंग कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया था, लेकिन संविधान तैयार करने में इनकी भूमिका सबसे अहम रही है।

इसका एक उदाहरण ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्य रहे टी. टी. कृष्णमाचारी के उस भाषण से समझा जा सकता है जो उन्होंने नवम्बर, 1948 को संविधान सभा में दिया था। अपने भाषण में अम्बेडकर की भूमिका के बारे में बताते हुए टी. टी. कृष्णमाचारी ने कहा, संविधान को तैयार करने वाली ड्राफ्टिंग कमेटी में 7 सदस्य थे। उनमें से एक सदस्य ने इस्तीफा दे दिया। एक सदस्य की मौत हो चुकी थी,एक सदस्य अमेरिका में थे और एक सदस्य सरकारी मसलों में इतना उलझे थे कि वो अपनी जिम्मेदारी को निभा नहीं पा रहे थे। दो सदस्य दिल्ली से दूर थे और कमेटी के कार्यवाही में हिस्सा नहीं ले पा रहे थे। इस तरह संविधान को लिखने का भार डॉ. अम्बेडकर पर आ पड़ा। हम सबको उनका आभारी होना चाहिए क्योंकि इस जिम्मेदारी भरे काम को उन्होंने सराहनीय तरीके से अंजाम दिया है। इसलिए इन्हें संविधान निर्माता कहा गया।

डॉ. अम्बेडकर न्याय के प्रहरी थे। वे दलित मानव कल्याण के मूलभूत सिद्धांत को अपनाकर, उनमें जागृति पैदा कर समाज के प्रतिनिधि बन गए। सच तो यह है कि पद, सत्ता, यश आदि से उन्हें आसक्ति नहीं थी। वे समाज कल्याण हेतु कार्य करना अपना कर्तव्य समझते थे। मनुष्य में महान कार्यों के संपादन के लिए आत्मविजय तथा आत्मविश्वास परम आवश्यक है। बाबासाहेब अम्बेडकर ने संकीर्ण सोच से ऊपर उठकर जीना सिखाया। जीवन तो सभी जीते हैं किंतु वास्तव
में वह सर्वाधिक जीवंत है, जो सर्वाधिक चिंतन करता है, सर्वाधिक अनुभव करता है और सर्वोत्कृष्ट कार्य करता है।

डॉ.अम्बेडकर एक सफल पत्रकार एवं प्रभावी सम्पादक भी थे। अखबारों के माध्यम से समाज में उन्नती होंगी, इस पर उन्हें विश्वास था। वह आन्दोलन में अखबार को बेहद महत्वपूर्ण मानते थे। उन्होंने शोषित एवं दलित समाज में जागृति लाने के लिए कई पत्र एवं पांच पत्रिकाओं का प्रकाशन एवं सम्पादन किया। इनसे उनके दलित आंदोलन को आगे बढ़ाने में
महत्वपूर्ण मदद मिली। उन्होंने कहा हैं कि, "किसी भी आन्दोलन को सफल बनाने के लिए अखबार की आवश्यकता होती हैं, अगर आन्दोलन का कोई अखबार नहीं है तो उस आन्दोलन की हालत पंख टुटे हुए पंछी की तरह होती हैं। डॉ॰ अम्बेडकर ही दलित पत्रकारिता के आधार स्तम्भ हैं क्योंकी वे दलित पत्रिकारिता के प्रथम सम्पादक, संस्थापक एवं प्रकाशक हैं।

2004 में अपने विश्वविद्यालय की स्थापना 200 वर्ष पुरे होने के उपलक्ष में अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय ने इस दिवस को विशेष रूप से मनाने का निर्णय लिया, उन्होंने अपने विश्वविद्यालय में पढ चुके शीर्ष के 100 बुद्धिमान विद्यार्थियों की कोलंबियन अहेड्स ऑफ देअर टाइम नामक सूची बनाई, जिन्होंने दुनिया में अपने अपने क्षेत्र महत्वपूर्ण योगदान दिया हो। जब यह सूची प्रकाशित कराई गई तो उसमें पहला नाम था ‘भीमराव अम्बेडकर’ था, तथा उनका उल्लेख आधुनिक भारत का निर्माता के रूप में किया गया। अम्बेडकर को सबसे अधिक बुद्धिमान विद्यार्थी यानी पहले कोलंबियन अहेड ऑफ देअर टाइम के रूप में घोषित किया गया।

1990 में, डॉ. भीमराव अम्बेडकर को मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। इस पुरस्कार को सविता अम्बेडकर ने भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति रामास्वामी वेंकटरमण द्वारा अंबेडकर के 99 वें जन्मदिवस, 14 अप्रैल 1990 को स्वीकार किया था। यह पुरस्कार समारोह राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल/अशोक हॉल में आयोजित किया गया था। वर्तमान संदर्भ में यदि कहा जाए तो डॉ. भीमराव अम्बेडकर एक अमर ज्योति है, जो अंधकारग्रस्त सामाजिक मानवता के लिए अविच्छिन्न आलोक स्रोत बन गई।

डॉ.पवन शर्मा

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